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Aatish Alok
ik shauq bhi kamaal hai ik khwaab bhi azeez
ik shauq bhi kamaal hai ik khwaab bhi azeez | इक शौक़ भी कमाल है इक ख़्वाब भी अज़ीज़
- Aatish Alok
इक
शौक़
भी
कमाल
है
इक
ख़्वाब
भी
अज़ीज़
दोनों
के
ज़द
में
आदमी
बे-मौत
ही
मरे
- Aatish Alok
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कभी
मिलो
तो
बताएँ
तुम्हें
कि
क्या
है
मुझे,
जिसे
समझते
हो
जन्नत
वही
सज़ा
है
मुझे
मैं
हर
किसी
को
तेरे
नाम
से
बुलाता
हूँ,
बिछड़
के
तुझ
सेे
अजब
रोग
लग
गया
है
मुझे
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Aatish Alok
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जो
रुका
हुआ
था
रुका
रहा
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
ये
अजब
रिवाज़
है
इश्क़
का
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
मैं
कभी
कभी
हूँ
ये
सोचता
कि
हवा
को
हाथ
से
रोक
लूँ
मैं
कभी
कभी
हूँ
ये
चाहता
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
न
मुझे
सुकून
न
नींद
ही
न
मिलेगा
चैन
ही
एक
दिन
ये
बहुत
दिनों
मुझे
खाएगा
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
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Aatish Alok
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शहर
में
भी
मैं
नहीं
जो
तुमको
पाया
लौट
आया
जब
उजाले
ने
ही
मुझको
काट
खाया
लौट
आया
इक
तरफ़
तो
थी
चमक
औ
इक
तरफ़
था
गाँव
मेरा
जैसे
ही
मैं
चौंधियाया
सर
घुमाया
लौट
आया
तुम
अना
पर
आ
गई
थी
सो
बताना
था
ज़रूरी
पा
भी
सकता
हूँ
मैं
तुमको
ये
बताया
लौट
आया
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Aatish Alok
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मैं
ख़ूब
ख़ुश
रहूँगा
तेरे
बोसे
से
मगर,
मुझे
है
तुम
सेे
पूछना
कि
ख़ुश
रहोगे
तुम
Aatish Alok
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आज
क़ब्रगाहों
में
हैं
पड़े
हुए
जिनको
लगता
था
ख़ुदा
इक
दिन
आएगा
बचाएगा
Aatish Alok
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