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Aamir Ali
naya hai safar rahnumaai nahin hai
naya hai safar rahnumaai nahin hai | नया है सफ़र रहनुमाई नहीं है
- Aamir Ali
नया
है
सफ़र
रहनुमाई
नहीं
है
ख़ुदास
मेरी
आशनाई
नहीं
है
सफ़र
में
मिले
हैं
कई
हम
सेफ़र
पर
किसी
से
मेरी
हमनवाई
नहीं
है
ज़माना
उसे
तो
ख़ुदा
मानता
है
मगर
उस
ख़ुदा
में
ख़ुदाई
नहीं
है
जहाँ
में
वफ़ा
का
यही
है
तराना
वफ़ा
आपने
भी
निभाई
नहीं
है
हदें
आपकी
सरहदें
आपकी
हैं
यहाँ
से
किसी
की
रिहाई
नहीं
है
- Aamir Ali
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मेरी
दु'आ
है
और
इक
तरह
से
बद्दुआ
भी
है
ख़ुदा
तुम्हें
तुम्हारे
जैसी
बेटियाँ
अता
करे
Tehzeeb Hafi
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किसी
के
तुम
हो
किसी
का
ख़ुदा
है
दुनिया
में
मेरे
नसीब
में
तुम
भी
नहीं
ख़ुदा
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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थे
ख़ुदा
को
मानने
वाले
बड़ी
तादाद
में
है
तअज्जुब
पर
ख़ुदा
की
मानता
कोई
न
था
Rao Nasir
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रहता
है
इबादत
में
हमें
मौत
का
खटका
हम
याद-ए-ख़ुदा
करते
हैं
कर
ले
न
ख़ुदा
याद
Akbar Allahabadi
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ज़िंदगी
अपनी
जब
इस
शक्ल
से
गुज़री
'ग़ालिब'
हम
भी
क्या
याद
करेंगे
कि
ख़ुदा
रखते
थे
Mirza Ghalib
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तुम
भी
वैसे
थे
मगर
तुम
को
ख़ुदा
रहने
दिया
इस
तरह
तुम
को
ज़माने
से
जुदा
रहने
दिया
Khalil Ur Rehman Qamar
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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सर
झुकाओगे
तो
पत्थर
देवता
हो
जाएगा
इतना
मत
चाहो
उसे
वो
बे-वफ़ा
हो
जाएगा
Bashir Badr
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माँ
बाप
और
उस्ताद
सब
हैं
ख़ुदा
की
रहमत
है
रोक-टोक
उन
की
हक़
में
तुम्हारे
नेमत
Altaf Hussain Hali
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ख़ुदा
की
शा'इरी
होती
है
औरत
जिसे
पैरों
तले
रौंदा
गया
है
तुम्हें
दिल
के
चले
जाने
पे
क्या
ग़म
तुम्हारा
कौन
सा
अपना
गया
है
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Ali Zaryoun
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यहाँ
से
वहाँ
हो
गए
हम
फ़ुलाँ
थे
फ़ुलाँ
हो
गए
हम
क़दम
दो
क़दम
चलते
चलते
कोई
कारवाँ
हो
गए
हम
गुमाँ
है
हमें
होने
का
तो
बड़े
बद-गुमाँ
हो
गए
हम
खिला
है
नया
फूल
जब
से
बशर
बाग़बाँ
हो
गए
हम
पढ़ी
आयत-ए-इश्क़
तुम
ने
यहाँ
तर्जुमाँ
हो
गए
हम
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Aamir Ali
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रहो
तुम
भी
यूँँ
जैसे
ग़म
रहा
है
मोहब्बत
का
यही
आलम
रहा
है
यहाँ
खिलता
नहीं
है
फूल
कोई
यहाँ
मौसम
भी
बे-मौसम
रहा
है
तुम्हें
क्या
याद
है
वो
पल
हमारे
यही
शिकवा
मुझे
हर
दम
रहा
है
ये
काग़ज़
पे
बिखरते
लफ़्ज़
देखो
पिघलते
अश्क
में
ख़ूँ
जम
रहा
है
कहीं
कोई
मेरे
जैसा
भी
'आमिर'
ख़ुदा
की
क़ैद
में
आदम
रहा
है
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Aamir Ali
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आईने
भी
अक्स
जब
खाने
लगे
फिर
जहालत
झूठ
फैलाने
लगे
हुर्रियत
आदी
हैं
ये
वाइज़
तेरे
मस्जिदों
से
मय-कदे
जाने
लगे
ज़ेब-ओ-ज़ीनत
कुछ
है
कुछ
फ़हम-ओ-फ़तन
ये
कहा
जो
तुम
तो
इतराने
लगे
दौर
कैसा
पेश
आया
है
कि
अब
ये
मुनाफ़िक़
भी
तुझे
भाने
लगे
देखने
पर
तो
मेरे
खिलते
थे
तुम
बात
क्या
गुज़री
जो
मुरझाने
लगे
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Aamir Ali
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सहरा
में
घूँट
घूँट
सा
वो
आब
इश्क़
है
अब
नींद
करवटों
में
है
और
ख़्वाब
इश्क़
है
Aamir Ali
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शब-ए-ग़म
में
हैं
राज़
कितने
पिरोए
यूँँ
अल्फ़ाज़
कितने
उठा
रेशमी
लाल
पर्दा
दिखाई
पड़े
साज़
कितने
वफ़ा
महज़
बातें
रही
है
वफ़ादार
हमराज़
कितने
ये
काँटे
ये
पत्थर
ये
ख़ंजर
हैं
अपनों
से
नाराज़
कितने
हैं
कुछ
दाग़
उस
चाँद
पर
जो
सुख़न-वर
भी
लफ़्फ़ाज़
कितने
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Aamir Ali
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