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Shubham Rai 'shubh'
mohabbat se nikalna jo kabhi to dekhna tum
mohabbat se nikalna jo kabhi to dekhna tum | मोहब्बत से निकलना जो कभी तो देखना तुम
- Shubham Rai 'shubh'
मोहब्बत
से
निकलना
जो
कभी
तो
देखना
तुम
किताब-ए-ज़ीस्त
के
पन्नों
में
लिक्खा
क्या
गया
था
- Shubham Rai 'shubh'
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इक
कहानी
में
पहले
सँवारा
गया
उस
कहानी
में
फिर
मुझको
मारा
गया
दर्द
भी
बाँटते
हम
किसी
से
मगर
बीच
अपनों
के
सिर
को
उतारा
गया
आप
मन्नत
किए
टूटते
देखकर
है
मिरा
दुख
किसी
घर
का
तारा
गया
घर
को
सहरा
समझते
रहे
उन
दिनों
गाँव
छूटा
लगा
वक़्त
प्यारा
गया
जुगनू
लेकर
भटकते
रहे
दर-ब-दर
शम्स
की
खोज
में
चाँद
तारा
गया
एक
मोती
मगर
हाथ
आया
नहीं
हाथ
से
भी
निकल
अब
किनारा
गया
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Shubham Rai 'shubh'
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देखो
है
कितनी
ख़ूब-सूरत
शाम
की
चालाकियाँ
मैं
चाहता
हूँ
साथ
तेरा,
और
उड़ती
तितलियाँ
Shubham Rai 'shubh'
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सुनाते
नहीं
थे
सुनाना
पड़ा
है
उसे
दर्द
मुझको
दिखाना
पड़ा
है
मुहब्बत
सफ़र
है
मुसाफ़िर
हैं
हम
भी
सो
दिल
को
ठिकाना
बनाना
पड़ा
है
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Shubham Rai 'shubh'
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ये
लोग
पूछेंगे
हमें
ज़रा
ख़राब
होने
दो
अधर
से
चूम
लेंगे
बस
मियाँ
शराब
होने
दो
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Shubham Rai 'shubh'
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इक
दफ़ा
गुज़रे
कभी
फिर
से
गुज़र
जाएँगे
ऐ
मोहब्बत
अब
तुझे
इनकार
कर
जाएँगे
Shubham Rai 'shubh'
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