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Shubham Rai 'shubh'
jeetate hi tum kahiin achha sa koii ghar banaoge
jeetate hi tum kahiin achha sa koii ghar banaoge | जीतते ही तुम कहीं अच्छा सा कोई घर बनाओगे
- Shubham Rai 'shubh'
जीतते
ही
तुम
कहीं
अच्छा
सा
कोई
घर
बनाओगे
काम
करने
की
जगह
तुम
घूम
कर
छुट्टी
मनाओगे
- Shubham Rai 'shubh'
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अना
पर
बात
आए
लहरों
को
भी
मोड़
दूँगा
कटे
गर्दन
भले
तेरी
अकड़
मैं
तोड़
दूँगा
रहूँगा
शान
से
चाहे
खड़ी
हो
मौत
सम्मुख
झुकाऊँगा
न
सर
अपना
ये
साँसें
छोड़
दूँगा
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फँसी
कश्ती
हमारी
है
दुखों
का
बोझ
भारी
है
सँभल
कर
चल
रहा
हूँ
जो
दया
गिरधर
तुम्हारी
है
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ख़ुदा
का
घर
अगर
कोई
नहीं
है
दिखा
मुझको
कि
डर
कोई
नहीं
है
उड़ी
दरगाह
की
चादर
हवा
में
बता
मौला
का
दर
कोई
नहीं
है
सभी
भगवान
जब
इंसान
में
हैं
तो
क्या
आदर्श
नर
कोई
नहीं
है
सिखाते
हैं
ग़ज़ल
कहना
वो
हमको
अभी
जिनको
हुनर
कोई
नहीं
है
धरा
पर
मोक्ष
है
अपना
बनारस
बनारस
सा
नगर
कोई
नहीं
है
बहुत
सारे
मकाँ
परदेस
में
हैं
मगर
घर
सा
शजर
कोई
नहीं
है
नवाज़िश
आपकी
है
सामने
हूँ
इधर
इल्म-ओ-हुनर
कोई
नहीं
है
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मुश्किल
घड़ी
में
साथ
मिलना
चाहिए
हो
बैर
फिर
भी
हाथ
मिलना
चाहिए
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प्रेम
होता
बुरा
तो
जताते
नहीं
पास
चलकर
के
तुम
भी
तो
आते
नहीं
राम
को
जानकी
प्रिय
न
होती
अगर
सिंधु
के
बीच
पुल
फिर
बनाते
नहीं
भाव
ही
देखते
है
सभी
का
प्रभु
वर्ना
शबरी
के
झूठन
वो
खाते
नहीं
चाहते
वो
कि
माया
में
उलझे
रहो
पाठ
गीता
का
फिर
वो
सुनाते
नहीं
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