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Shubham Rai 'shubh'
bichhadne ka gham tumko kyun hai
bichhadne ka gham tumko kyun hai | बिछड़ने का ग़म तुमको क्यूँँ है
- Shubham Rai 'shubh'
बिछड़ने
का
ग़म
तुमको
क्यूँँ
है
रहो
ख़ुश
कि
आज़ाद
हो
तुम
- Shubham Rai 'shubh'
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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भला
तुम
कैसे
जानोगे
मिला
है
दर्द
जो
गहरा
वो
जैसे
नोचता
है
बाल
अपने
नोच
कर
देखो
Kushal "PARINDA"
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खुशियाँ
उसी
के
साथ
हैं
जो
ग़म
गुसार
है
ऐसे
हरेक
शख़्स
ही
दुनिया
का
यार
है
Sunny Seher
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पास
जब
तक
वो
रहे
दर्द
थमा
रहता
है
फैलता
जाता
है
फिर
आँख
के
काजल
की
तरह
Parveen Shakir
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ज़ख़्म
दिल
पर
हज़ार
करता
है
और
कहता
है
प्यार
करता
है
दर्द
दिल
में
उतर
गया
कैसे
कोई
अपना
ही
वार
करता
है
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Santosh S Singh
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ये
ग़म
हमको
पत्थर
कर
देगा
इक
दिन
कोई
आ
कर
हमें
रुलाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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हाए
उसके
हाथ
पीले
होने
का
ग़म
इतना
रोए
हैं
कि
आँखें
लाल
कर
ली
Harsh saxena
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इस
क़दर
जज़्ब
हो
गए
दोनों
दर्द
खेंचूँ
तो
दिल
निकल
आए
Abbas Qamar
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मुस्कुराती
नज़र
का
छल
जानता
हूँ,
आज
हर
हाथ
का
मैं
बल
जानता
हूँ
अश्क
के
बाद
जो
रिश्ता
बच
गया
है,
ये
न
आगे
बढ़ेगा
कल
जानता
हूँ
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Shubham Rai 'shubh'
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सबका
आकार
समझने
वाले
सबको
लाचार
समझने
वाले
मुँह
छिपाए
वो
फिरेंगे
इक
दिन
हमको
बेकार
समझने
वाले
फ़ायदा
लोग
उठाए
हैं
पर
कुछ
मिले
यार
समझने
वाले
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Shubham Rai 'shubh'
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डरावनी
है
जो
तुझ
को
तिरी
क़ज़ा
ही
न
हो
न
भाग
इतना
कि
अंजाम
का
पता
ही
न
हो
दिखावे
की
होड़
में
क्या
मिले
नहीं
आप
से
दिखा
रहे
जैसे
कुछ
भी
अता
पता
ही
न
हो
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Shubham Rai 'shubh'
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छुप
के
दीदार
बहुत
करता
है
मुझको
बेज़ार
बहुत
करता
है
प्यार
वो
रात-गए
करता
है
दिन
में
तकरार
बहुत
करता
है
काम
करता
है
सभी
मेरा
पर
पहले
इनकार
बहुत
करता
है
मेरे
झुमके
के
लिए
वो
घर
को
ख़ास-बाज़ार
बहुत
करता
है
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Shubham Rai 'shubh'
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किसी
हद
से
गुज़रना
चाहता
हूँ
तुम्हें
छू
कर
बिखरना
चाहता
हूँ
किसी
दिन
पर्दे
से
मुझको
निहारो
मैं
अब
सजना
सँवरना
चाहता
हूँ
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Shubham Rai 'shubh'
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