muddat hui nikle hain yahii soch ke ghar se | मुद्दत हुई निकले हैं यही सोच के घर से

  - Zakir Waqar
मुद्दतहुईनिकलेहैंयहीसोचकेघरसे
मंज़िलजोमिलेगीतभीलौटेंगेसफ़रसे
दुनियानेहमेंसमझाहैकाँटोंकामुबल्लिग़
हमफूलखिलातेहैंगुज़रतेहैंजिधरसे
देखाहैउन्हेंसब्ज़सेख़ुश्कीमेंबदलते
रिश्ताजोकभीटूटाहोपत्तोंकाशजरसे
इज़हार-ए-मोहब्बतसेभीमहरूमहैक्यूँँकर
हमतुझकोकहींखोदेंइसबातकेडरसे
दुनियामें'वक़ार'उससाहसींमिलसकेगा
लैलाकोकोईदेखेतोमजनूँकीनज़रसे
  - Zakir Waqar
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