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Zain Aalamgir
paayal pahan usne rakhi
paayal pahan usne rakhi | पायल पहन उसने रखी
- Zain Aalamgir
पायल
पहन
उसने
रखी
छन-छन
मिरा
दिल
कर
रहा
- Zain Aalamgir
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नादानी
ये
ज़रा
सी
ले
ले
न
जान
मेरी
फूलों
से
भर
रखी
है
मैंने
मयान
मेरी
हैं
आपको
जो
शिकवे
मेरी
ज़बान
से
जाँ
तो
काट
लें
लबों
से
अपने
ज़बान
मेरी
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vivek sahu
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बना
रक्खी
हैं
दीवारों
पे
तस्वीरें
परिंदों
की
वगर्ना
हम
तो
अपने
घर
की
वीरानी
से
मर
जाएँ
Afzal Khan
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बात
ऐसी
भी
भला
आप
में
क्या
रक्खी
है
इक
दिवाने
ने
ज़मीं
सर
पे
उठा
रक्खी
है
इत्तिफ़ाक़न
कहीं
मिल
जाए
तो
कहना
उस
सेे
तेरे
शाइर
ने
बड़ी
धूम
मचा
रक्खी
है
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Ismail Raaz
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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कहते
भी
हैं
कि
हम
सेे
मुहब्बत
नहीं
उन्हें
और
अब
तलक
रखी
है
निशानी
सँभाल
कर
Divy Kamaldhwaj
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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अब
ऐसे
ज़ाविए
पर
लौ
रखी
जाने
लगी
है
चराग़ों
के
तले
भी
रोशनी
जाने
लगी
है
नया
पहलू
सलीक़े
से
बयाँ
करना
पड़ेगा
कहानी
अब
तवज्जोह
से
सुनी
जाने
लगी
है
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Khurram Afaq
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कैसी
बिपता
पाल
रखी
है
क़ुर्बत
की
और
दूरी
की
ख़ुशबू
मार
रही
है
मुझ
को
अपनी
ही
कस्तूरी
की
Naeem Sarmad
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वर्षों
की
सब
याद
सजा
के
रक्खी
है
घर
में
बस
सामान
नहीं
है,
समझा
कर
Shivam Tiwari
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तुम
ने
उस
रोज़
क़यामत
ही
उठा
रक्खी
थी
तुम
ने
उस
रोज़
मुझे
देखते
देखा
होता
Tarkash Pradeep
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मलाल-ए-तर्क
निस्बत
का
कभी
रख
ना
सका
दिल
में
मुनासीब
है
नहीं
तेरी
जगह
दिल
में
किसी
को
दूँ
Zain Aalamgir
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दो-चार
मिसरे
जो
लिखे,
सब
मिट
गए
किरदार
सारे
ही
कहानी
के
मरे
Zain Aalamgir
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महरूम
है
मुक़द्दर
में
प्यार
शख़्स
के
पर
बस
दरमियाँ
सुजूद-ए-अल्लाह
फ़ासले
में
Zain Aalamgir
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अलविदा
क्यूँ
कर
रहे
चेहरे
सभी
इक
दूसरे
को
था
कभी
मक़सद
बने
सब
आईना
इक
दूसरे
का
Zain Aalamgir
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है
हाल
ज़िन्दगी
का
कितना
अजब
कहूँ
क्या
आधी
रहे
कहानी
आधी
रहे
दुहाई
Zain Aalamgir
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