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Zain Aalamgir
mujhko ujaalon se raha hai khauf ke
mujhko ujaalon se raha hai khauf ke | मुझको उजालों से रहा है ख़ौफ़ के
- Zain Aalamgir
मुझको
उजालों
से
रहा
है
ख़ौफ़
के
संगीन
अँधेरा
छुपाए
है
रख़े
- Zain Aalamgir
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दिन
में
मिल
लेते
कहीं
रात
ज़रूरी
थी
क्या?
बेनतीजा
ये
मुलाक़ात
ज़रूरी
थी
क्या
मुझ
सेे
कहते
तो
मैं
आँखों
में
बुला
लेता
तुम्हें
भीगने
के
लिए
बरसात
ज़रूरी
थी
क्या
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Abrar Kashif
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ठंडी
चाय
की
प्याली
पी
के
रात
की
प्यास
बुझाई
है
Rais Farog
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फेंक
कर
रात
को
दीवार
पे
मारे
होते
मेरे
हाथों
में
अगर
चाँद
सितारे
होते
Unknown
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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चाँद
तारे
इक
दिया
और
रात
का
कोमल
बदन
सुब्ह-दम
बिखरे
पड़े
थे
चार
सू
मेरी
तरह
Aziz Nabeel
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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हाल
मीठे
फलों
का
मत
पूछो
रात
दिन
चाकूओं
में
रहते
हैं
Fahmi Badayuni
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तस्वीर
में
जो
क़ैद
था
वो
शख़्स
रात
को
ख़ुद
ही
फ़्रेम
तोड़
के
पहलू
में
आ
गया
Adil Mansuri
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आधी
रात
की
चुप
में
किस
की
चाप
उभरती
है
छत
पे
कौन
आता
है
सीढ़ियाँ
नहीं
खुलतीं
Parveen Shakir
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अभी
हमको
मुनासिब
आप
होते
से
नहीं
लगते
ब–चश्म–ए–तर
मुख़ातिब
हैं
प
रोते
से
नहीं
लगते
वही
दर्या
बहुत
गहरा
वही
तैराक
हम
अच्छे
हुआ
है
दफ़्न
मोती
अब
कि
गोते
से
नहीं
लगते
ये
आई
रात
आँखों
को
चलो
खूँ–खूँ
किया
जाए
बदन
ये
सो
भी
जाए
आँख
सोते
से
नहीं
लगते
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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कैसी
वफ़ा
तुझ
सेे
निभा
जाता
यहाँ
पत्ता
बिछड़
सीधे
शजर
से
आ
हथेली
पर
तिरे
गिर
जाए
जो
Zain Aalamgir
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पहली
दफ़ा
जब
जाम
होटों
से
लगाया
तो
लगा
लब
के
तिरे
होते
हुए
मय
की
तलब
थी
ही
नहीं
Zain Aalamgir
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जो
न
तुम
सेे
हो
सकी,
महताब
बातें
जानता
है
गुफ़्तगू
हालात
दिल
की
रात
कर
लेगी
बयाँ
अब
Zain Aalamgir
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जानिब
चलू
मैं
रौशनी
के,
तीरगी
पीछा
करे
मैं
छोड़कर
तुझको
चलू
किस
सू,
कि
साया
पूछता
Zain Aalamgir
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के
सुर्खियाँ
तिरे
लब
से
इस
तरह
बरसती
लब
पानी
को
नहीं,
पानी
लब
को
है
तरसता
Zain Aalamgir
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