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shartein
shartein | "शर्तें"
- ZARKHEZ
"शर्तें"
वो
एक
लम्हा
जो
उसकी
मेरी
अमीक़
क़ुर्बत
की
रौशनी
था
हमारी
दोनों
की
ज़िन्दगी
था
अजीब
शर्तों
पे
जल
रहा
है
वो
लम्हा
करवट
बदल
रहा
है
वो
कह
रही
है
कि
मुझ
सेे
मिलने
की
आरज़ू
तुम
जब
इतनी
ज़ियादा
शदीद
कर
लो
कि
साँस
लेने
में
मुश्किलें
हों
तो
मुझको
आकर
गले
लगाना
और
अपनी
सारी
उखड़ती
साँसों
की
क़ैद
परियाँ
छुड़ा
ले
जाना
लिहाज़ा
इक
दिन
मैं
जैसे
तैसे
तमाम
अपनी
उखड़ती
साँसों
की
क़ैद
परियाँ
बचाने
निकला
छुड़ाने
निकला
तो
भेद
जाना
किसे
ख़बर
थी
कि
मेरी
साँसें
जब
एक
मंज़िल
पे
जा
रुकेंगी
तो
उसकी
शर्तें
नकार
देंगी
वो
एक
लम्हा
जो
उसकी
मेरी
अमीक़
क़ुर्बत
की
रौशनी
था
हमारी
दोनों
की
ज़िन्दगी
था
हलाक
शर्तों
को
कर
गया
है
किसी
अँधेरे
में
मर
गया
है
- ZARKHEZ
उन
सेे
जिस
दिन
सामना
हो
जाएगा
ज़ख़्म
से
फिर
राब्ता
हो
जाएगा
इन
अँधेरों
में
तुम्हारी
याद
से
रौशनी
का
हक़
अदा
हो
जाएगा
मैंने
अपनी
आँख
भी
खोली
अगर
राहबर
मुझ
सेे
ख़फ़ा
हो
जाएगा
गुल
खिले
हैं
और
हवाएँ
तेज़
हैं
आज
फिर
वो
हादसा
हो
जाएगा
जज़्बा-ए-सुक़रात
पैदा
कीजिए
ज़हर
भी
आब-ए-बक़ा
हो
जाएगा
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सब
को
रातें
बाँट
रहा
है
सूरज
जिस
का
नाम
रखा
है
इक
बच्चे
ने
मॉल
में
पूछा
सर्दी
का
दिन
कितने
का
है
ऐ
साहिल
पर
चलने
वाले
दरिया
तुझ
को
घूर
रहा
है
अपने
घर
में
आग
लगा
कर
अब
वो
टी
वी
देख
रहा
है
मुझ
को
हासिल
मुख़्तारी
है
लेकिन
मेरे
हाथ
में
क्या
है
दौड़ो
जाओ
कुर्सी
लाओ
रुपया
नीचे
बैठ
रहा
है
अब
वो
सब
को
भटका
देगा
उसने
रस्ता
देख
लिया
है
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क़दम
बढ़ाए
गए
जब
भी
ज़िंदगी
की
तरफ़
किसी
ने
खींच
लिया
हमको
शा'इरी
की
तरफ़
ये
लोग
आपको
ज़िंदा
जला
भी
सकते
हैं
अगरचे
बढ़ते
रहे
यूँँ
ही
रौशनी
की
तरफ़
कोई
सदा
भी
मेरे
कान
तक
न
पहुँचेगी
पहुँच
गया
मैं
अगर
अपनी
ख़ामुशी
की
तरफ़
हर
इक
ख़याल
से
आया
मुझे
ख़याल
तेरा
हर
इक
गली
से
मैं
पहुँचा
तेरी
गली
की
तरफ़
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रात
ढलने
वाली
है
आँख
लगने
वाली
है
इक
दरख़्त
के
नीचे
धूप
पलने
वाली
है
अब्र
छाने
वाला
है
ख़ाक
उड़ने
वाली
है
आज
एक
दरिया
में
आग
लगने
वाली
है
बाग़
में
ख़िज़ाँ
आ
कर
फूल
चुनने
वाली
है
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आप
की
महफ़िल
में
सब
थे
ख़ामुशी
पहने
हुए
मेरे
आते
ही
तमाशा-गर
तमाशा
किस
लिए
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