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achaanak hijr men fariyaad kar ke
achaanak hijr men fariyaad kar ke | अचानक हिज्र में फ़रियाद कर के
- ZARKHEZ
अचानक
हिज्र
में
फ़रियाद
कर
के
ठहर
जाता
हूँ
तुझको
याद
कर
के
वो
मुझको
क़ैद
करता
जा
रहा
है
मेरी
हर
आरज़ू
आज़ाद
कर
के
सुख़न-साज़ी
को
इक
दिन
छोड़
देंगे
लब-ओ-लहजा
नया
ईजाद
कर
के
कोई
हाथों
में
इक
तेशा
थमा
दे
मुझे
ज़रख़ेज़
से
फ़रहाद
कर
के
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आइना
उसने
तोड़
फेंका
है
मेरी
आँखों
में
काँच
बिखरा
है
मैं
तेरे
लब
तो
चूम
लेता
हूँ
फिर
मेरे
लब
से
ख़ून
बहता
है
बंद
कर
के
तमाम
दरवाज़े
तेरी
ख़ुशबू
को
रोक
रक्खा
है
मैं
यहाँ
बस्तियों
में
तन्हा
हूँ
दश्त
भी
दश्त
में
अकेला
है
जिस
जगह
तुमने
हाथ
छोड़ा
था
दिल
उसी
बाग़
में
टहलता
है
मेरी
हद
थी
फ़क़त
दरीचों
तक
मेरा
बचपन
ख़राब
गुज़रा
है
फिर
तो
जलना
भी
लाज़िमी
होगा
गर
तुझे
तीरगी
निगलना
है
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आ
रहा
है
बहार
का
मौसम
फूल
निकलेंगे
मेरे
ज़ख़्मों
से
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अगर
ज़ाहिर
करूँँगा
आसमाँ
पर
ख़्वाहिशें
अपनी
मुझे
इस
बात
का
डर
है
सितारे
टूट
जाएँगे
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मैं
अपने
घर
के
सभी
रास्तों
को
भूल
गया
तेरे
बदन
का
हर
इक
तिल
शुमार
करते
हुए
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सब
को
रातें
बाँट
रहा
है
सूरज
जिस
का
नाम
रखा
है
इक
बच्चे
ने
मॉल
में
पूछा
सर्दी
का
दिन
कितने
का
है
ऐ
साहिल
पर
चलने
वाले
दरिया
तुझ
को
घूर
रहा
है
अपने
घर
में
आग
लगा
कर
अब
वो
टी
वी
देख
रहा
है
मुझ
को
हासिल
मुख़्तारी
है
लेकिन
मेरे
हाथ
में
क्या
है
दौड़ो
जाओ
कुर्सी
लाओ
रुपया
नीचे
बैठ
रहा
है
अब
वो
सब
को
भटका
देगा
उसने
रस्ता
देख
लिया
है
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