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ALI ZUHRI
yah bhi mumkin hai ki mil jaayen kahii dono ham
yah bhi mumkin hai ki mil jaayen kahii dono ham | यह भी मुमक़िन है कि मिल जाएँ कहीं दोनों हम
- ALI ZUHRI
यह
भी
मुमक़िन
है
कि
मिल
जाएँ
कहीं
दोनों
हम
पर
ज़रूरी
तो
नहीं
मिलना
ज़रूरी
हो
हमें
जिस
मुलाक़ात
का
वा'दा
था
बिछड़ने
के
वक़्त
वो
मुलाक़ात
हमेशा
ही
अधूरी
हो
हमें
- ALI ZUHRI
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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इक
बे-क़रार
दिल
से
मुलाक़ात
कीजिए
जब
मिल
गए
हैं
आप
तो
कुछ
बात
कीजिए
Naushad Ali
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वस्ल
हो
जाए
यहीं
हश्र
में
क्या
रक्खा
है
आज
की
बात
को
क्यूँँ
कल
पे
उठा
रक्खा
है
Ameer Minai
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ये
भी
मुमकिन
है
मियाँ
आँख
भिगोने
लग
जाऊँ
वो
कहे
कैसे
हो
तुम
और
मैं
रोने
लग
जाऊँ
ऐ
मेरी
आँख
में
ठहराए
हुए
वस्ल
के
ख़्वाब
मैं
तवातुर
से
तेरे
साथ
न
सोने
लग
जाऊँ
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Ejaz Tawakkal Khan
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तेरा
मिलना
ख़ुशी
की
बात
सही
तुझ
से
मिल
कर
उदास
रहता
हूँ
Sahir Ludhianvi
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मुझ
से
मिलना
तो
ऐसे
मिलना
तू
मिले
है
गुल
को
जैसे
रंग-ओ-बू
Chandan Sharma
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ये
किस
ने
बाग़
से
उस
शख़्स
को
बुला
लिया
है
परिंद
उड़
गए
पेड़ों
ने
मुँह
बना
लिया
है
उसे
पता
था
मैं
छूने
में
वक़्त
लेता
हूँ
सो
उस
ने
वस्ल
का
दौरानिया
बढ़ा
लिया
है
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Tehzeeb Hafi
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नज़दीकी
अक्सर
दूरी
का
कारन
भी
बन
जाती
है
सोच-समझ
कर
घुलना-मिलना
अपने
रिश्ते-दारों
में
Aalok Shrivastav
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गले
मिलना
न
मिलना
तो
तेरी
मर्ज़ी
है
लेकिन
तेरे
चेहरे
से
लगता
है
तेरा
दिल
कर
रहा
है
Tehzeeb Hafi
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'हर्ष'
वस्ल
में
जितनी
मर्ज़ी
शे'र
कह
लो
तुम
हिज्र
के
बिना
इन
में
जान
आ
नहीं
सकती
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Harsh saxena
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जब
मुझे
याद
कर
रही
होगी
आँख
शबनम
से
भर
रही
होगी
वक़्त
बा
वक़्त
अपने
ही
अंदर
साँस
दर
साँस
मर
रही
होगी
वो
थी
मूरत
हाँ
रेत
की
मूरत
धीरे
धीरे
बिखर
रही
होगी
नाज़ुकी
से
वजूद
की
अपने
कँपकँपाती
सिहर
रही
होगी
सर
से
आँचल
ढलक
गया
होगा
शाम
छत
पर
उतर
रही
होगी
उसकी
रंगत
लपेट
कर
ख़ुद
में
धूप
यारों
निखर
रही
होगी
फूल
ही
फूल
खिल
गए
होंगे
जब
कभी
वो
जिधर
रही
होगी
आँखों
में
इश्क़
दिख
रहा
होगा
पर
ज़बाँ
से
मुकर
रही
होगी
हम
से
पहले
भी
और
कितनों
की
ये
गली
रह-गुज़र
रही
होगी
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ALI ZUHRI
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जो
कल
शब
से
तन्हा
था
कैसा
होगा
वो
निस्फ़
चाँद
अब
जाने
किस
का
होगा
ALI ZUHRI
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तुम
से
सीखा
मैंने
उसूल
पे
क़ायम
रहना
तेरे
सारे
वादे
सच्चे
लगते
हैं
मुझको
ALI ZUHRI
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फ़लसफ़ी
इश्क़
पे
लिखते
है
फ़साने
कितने
इस
समुंदर
में
हुए
ग़र्क़
ज़माने
कितने
शा'इरी
इश्क़
ख़ुदा
जाम
किताबें
औरत
एक
जीवन
को
बिताने
के
बहाने
कितने
कभी
स्कूल
कभी
गलियाँ
कभी
मय-ख़ाना
उम्र
के
साथ
बदलते
हैं
ठिकाने
कितने
एक
हफ़्ता
ही
जुदाई
का
सहा
जाता
नहीं
मौसम-ए-हिज्र
अभी
और
हैं
आने
कितने
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ALI ZUHRI
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मोहब्बत
से
मुझे
पागल
जो
कहती
है
हक़ीक़त
में
मुझे
पागल
वो
कर
देगी
ALI ZUHRI
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