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ALI ZUHRI
mohabbat aabgeenon men haseenon naazneenon men
mohabbat aabgeenon men haseenon naazneenon men | मोहब्बत आबगीनों में हसीनों नाज़नीनों में
- ALI ZUHRI
मोहब्बत
आबगीनों
में
हसीनों
नाज़नीनों
में
बड़ी
वहशत
सी
होती
है
दिलों
के
इन
मकीनों
में
- ALI ZUHRI
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दिल
में
जो
मोहब्बत
की
रौशनी
नहीं
होती
इतनी
ख़ूब-सूरत
ये
ज़िंदगी
नहीं
होती
Hastimal Hasti
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जब
चाहें
सो
जाते
थे
हम,
तुम
सेे
बातें
करके
तब
उल्टी
गिनती
गिनने
से
भी
नींद
नहीं
आती
है
अब
इश्क़
मुहब्बत
पर
ग़ालिब
के
शे'र
सुनाए
उसको
जब
पहले
थोड़ा
शरमाई
वो
फिर
बोली
इसका
मतलब?
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Tanoj Dadhich
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इश्क़
के
रंग
में
ऐ
मेरे
यार
रंग
आया
फिर
आज
रंगों
का
तेहवार
रंग
हो
गुलाबी
या
हो
लाल
पीला
हरा
आ
लगा
दूँ
तुझे
भी
मैं
दो
चार
रंग
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Afzal Ali Afzal
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कितना
झूठा
था
अपना
सच्चा
इश्क़
हिज्र
से
दोनों
ज़िंदा
बच
निकले
Prit
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जँचने
लगा
है
दर्द
मुझे
आपका
दिया
बर्बाद
करने
वाले
ने
ही
आसरा
दिया
कल
पहली
बार
लड़ने
की
हिम्मत
नहीं
हुई
मुझको
किसी
के
प्यार
ने
बुजदिल
बना
दिया
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Kushal Dauneria
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मेरा
किरदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
ये
समझदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
इश्क़
है
वादा-फ़रामोश
नहीं
है
कोई
दिल
तलबगार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
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Vishal Singh Tabish
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हर
मुलाक़ात
पे
सीने
से
लगाने
वाले
कितने
प्यारे
हैं
मुझे
छोड़
के
जाने
वाले
ज़िंदगी
भर
की
मोहब्बत
का
सिला
ले
डूबे
कैसे
नादाँ
थे
तिरे
जान
से
जाने
वाले
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Vipul Kumar
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दूजा
इश्क़
किया
तो
ये
मालूम
हुआ
पहले
वाले
में
भी
ग़लती
मेरी
थी
Tanoj Dadhich
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किताब-ए-इश्क़
में
हर
आह
एक
आयत
है
पर
आँसुओं
को
हुरूफ़-ए-मुक़त्तिआ'त
समझ
Umair Najmi
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'असद'
ये
शर्त
नहीं
है
कोई
मुहब्बत
में
कि
जिस
सेे
प्यार
करो
उसकी
आरज़ू
भी
करो
Subhan Asad
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तीरगी
में
जब
मुझे
वो
रो
चुका
था
वो
ज़माने
में
सभी
कुछ
खो
चुका
था
एक
ही
फोटो
पुरानी
जो
बची
है
वो
भला
चेहरा
अलग
सा
हो
चुका
था
जब
कि
मुस्तक़बिल
बना
के
लौट
पाया
उस
हसीं
का
यार
सौदा
हो
चुका
था
अब
निशाँ
मेरा
नहीं
उसको
मिलेगा
वो
पता
मेरा
सभी
कुछ
खो
चुका
था
एक
मुद्दत
बाद
वो
हम
से
मिला
तो
हाल
कैसा
तब
हमारा
हो
चुका
था
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ALI ZUHRI
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अरब
लहू
गोया
मिस्री
लहजा
है
उसका
उसने
तो
पैकर
अफ़्ग़ानी
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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ज़िंदगी
को
ख़राब
कर
रहा
हूँ
दिल
पे
तारी
अज़ाब
कर
रहा
हूँ
एक
लड़की
को
सोच
सोच
के
मैं
दिल
को
मिस्ल-ए-गुलाब
कर
रहा
हूँ
आदतें
लग
गईं
हैं
मयकशी
की
पानी
को
भी
शराब
कर
रहा
हूँ
हालत-ए-दिल
गुज़ार
कर
ख़ुद
पे
बीते
माज़ी
को
ख़्वाब
कर
रहा
हूँ
और
दुनिया
में
खो
चुका
हूँ
मैं
रम्ज़-ए-पर्दा
हिजाब
कर
रहा
हूँ
मेरे
ग़म
मेरे
हैं
मैं
ही
जानूँ
ख़त्म
सब
सेे
हिसाब
कर
रहा
हूँ
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ALI ZUHRI
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जब
भी
माज़ी
के
ज़ख़्मों
पर
मुझे
हवा
लगती
है
बन
के
मरहम
दिल
पे
सिगरेट
ही
दवा
लगती
है
ALI ZUHRI
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लब
हैं
जैसे
गुल
सुमबुल
रंग-ए-याक़ूती
ख़ुद
को
मैख़ाना
तितली
का
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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