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ALI ZUHRI
zindagi ko kharab kar raha hooñ
zindagi ko kharab kar raha hooñ | ज़िंदगी को ख़राब कर रहा हूँ
- ALI ZUHRI
ज़िंदगी
को
ख़राब
कर
रहा
हूँ
दिल
पे
तारी
अज़ाब
कर
रहा
हूँ
एक
लड़की
को
सोच
सोच
के
मैं
दिल
को
मिस्ल-ए-गुलाब
कर
रहा
हूँ
आदतें
लग
गईं
हैं
मयकशी
की
पानी
को
भी
शराब
कर
रहा
हूँ
हालत-ए-दिल
गुज़ार
कर
ख़ुद
पे
बीते
माज़ी
को
ख़्वाब
कर
रहा
हूँ
और
दुनिया
में
खो
चुका
हूँ
मैं
रम्ज़-ए-पर्दा
हिजाब
कर
रहा
हूँ
मेरे
ग़म
मेरे
हैं
मैं
ही
जानूँ
ख़त्म
सब
सेे
हिसाब
कर
रहा
हूँ
- ALI ZUHRI
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इक
रोज़
इक
नदी
के
किनारे
मिलेंगे
हम
इक
दूसरे
से
अपना
पता
पूछते
हुए
Shahbaz Rizvi
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मैं
तो
मुद्दत
से
ग़ैर-हाज़िर
हूँ
बस
मेरा
नाम
है
रजिस्टर
में
याद
करती
हैं
तुझको
दीवारें
शक्ल
उभर
आई
है
पलस्तर
में
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Azhar Nawaz
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पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ
था
हर
नग़्मा-ए-कृष्ण
बाँसुरी
का
Hasrat Mohani
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किनारे
दो
मिलाने
में
हैं
कितनी
मुश्किलें
सोचो
ये
पुल
दिन
भर
ही
सीने
पे
बिचारा
चोट
खाता
है
Prashant Beybaar
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भेज
देता
हूँ
मगर
पहले
बता
दूँ
तुझ
को
मुझ
से
मिलता
नहीं
कोई
मिरी
तस्वीर
के
बाद
Umair Najmi
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बातें
करो
तो
बोलती
है
बोलते
हो
तुम
बहुत
उसने
किनारे
पे
से
लहरें
देखी
गहराई
नहीं
100rav
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गुज़रता
ही
नहीं
वो
एक
लम्हा
इधर
मैं
हूँ
कि
बीता
जा
रहा
हूँ
Madan Mohan Danish
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अब
ये
भी
नहीं
ठीक
कि
हर
दर्द
मिटा
दें
कुछ
दर्द
कलेजे
से
लगाने
के
लिए
हैं
Jaan Nisar Akhtar
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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आँख
में
पानी
रखो,
होंटों
पे
चिंगारी
रखो
ज़िंदा
रहना
है
तो
तरकीबें
बहुत
सारी
रखो
Rahat Indori
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इसलिए
फोन
का
नंबर
नहीं
बदला
मैंने
तुम
मुझे
कॉल
करोगी
कि
ज़रूरत
है
अली
एक
ही
जुमला
तो
सुनना
था
मुझे
तुम
सेे
मगर
ये
भी
तुमने
न
कहा
तुम
सेे
मोहब्बत
है
अली
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ALI ZUHRI
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मेरी
तमाम
ज़िंदगी
बर्बाद
कर
के
अब
मसरूफ़
होगी
ईद
कि
तय्यारियों
में
वो
ALI ZUHRI
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जब
मुझे
याद
कर
रही
होगी
आँख
शबनम
से
भर
रही
होगी
वक़्त
बा
वक़्त
अपने
ही
अंदर
साँस
दर
साँस
मर
रही
होगी
वो
थी
मूरत
हाँ
रेत
की
मूरत
धीरे
धीरे
बिखर
रही
होगी
नाज़ुकी
से
वजूद
की
अपने
कँपकँपाती
सिहर
रही
होगी
सर
से
आँचल
ढलक
गया
होगा
शाम
छत
पर
उतर
रही
होगी
उसकी
रंगत
लपेट
कर
ख़ुद
में
धूप
यारों
निखर
रही
होगी
फूल
ही
फूल
खिल
गए
होंगे
जब
कभी
वो
जिधर
रही
होगी
आँखों
में
इश्क़
दिख
रहा
होगा
पर
ज़बाँ
से
मुकर
रही
होगी
हम
से
पहले
भी
और
कितनों
की
ये
गली
रह-गुज़र
रही
होगी
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ALI ZUHRI
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तेरे
हाथों
से
यह
रिस्ता
हुआ
लहू
ज़हर
कि
जैसे
दिल
पे
कहीं
टपकता
है
ALI ZUHRI
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अब
मोहब्बत
में
क्या
करे
कोई
ज़ख़्म-ए-दिल
को
सिला
करे
कोई
हुस्न
नामी
किसी
समुंदर
में
रेत
बन
के
बहा
करे
कोई
हाए
वो
इश्क़
का
असर
पहला
फूल
जैसे
खिला
करे
कोई
इश्क़
है
एक
फितना
ए
मलऊन
विर्द
लाहौल
का
करे
कोई
अपने
महबूब
को
ख़ुदा
कहकर
क्यूँँ
ख़ुदास
गिला
करे
कोई
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ALI ZUHRI
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