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Vishakt ki Kalam se
akelaa hi raha hooñ main akelaa ghalatiyaan dhoi
akelaa hi raha hooñ main akelaa ghalatiyaan dhoi | अकेला ही रहा हूँ मैं अकेले ग़लतियाँ ढोई
- Vishakt ki Kalam se
अकेला
ही
रहा
हूँ
मैं
अकेले
ग़लतियाँ
ढोई
वही
हूँ
शब्द
मैं
जिसका
नहीं
है
क़ाफ़िया
कोई
- Vishakt ki Kalam se
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यूँँ
ही
थोड़ी
मेरी
गज़लों
में
इतना
दुख
होता
है
इस
दुनिया
ने
हम
लड़कों
से
रोने
का
हक़
छीना
है
Harsh saxena
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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जिसे
जो
जी
में
आता
है
सो
लिखता
है
बड़ा
मुश्किल
है
कह
पाना
क़लम
का
दुख
Harsh saxena
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पहले
ये
काम
बड़े
प्यार
से
माँ
करती
थी
अब
हमें
धूप
जगाती
है
तो
दुख
होता
है
Munawwar Rana
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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हँसते
हँसते
निकल
पड़े
आँसू
रोते
रोते
कभी
हँसी
आई
Anwar Taban
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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रास
आ
जाएगा
इक
रोज़
तेरा
जाना
भी
हम
किसी
दुख
में
लगातार
नहीं
रोते
हैं
Inaam Azmi
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पेड़
को
काटने
वाले
क्या
जाने
दुख
हम
गले
लग
नहीं
सकते
दीवार
से
Neeraj Neer
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कोई
हादसा
लेकर
आदमी
किधर
जाए
आदमी
अगर
कह
दे
हादसा
उदासी
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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महीने
बाद
वो
कुछ
और
ही
था
उसे
मुझ
से
मिलाने
ग़ैर
लाए
Vishakt ki Kalam se
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सिकंदर
से
कभी
आँखें
मिलाना
चाहता
था
वही
आँखें
उठाना
आज
भारी
हो
गया
है
नहीं
जो
मानता
था
हार
छोटे
खेल
में
भी
वही
हारा
ज़माने
से
लिखारी
हो
गया
है
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भला
इस
सेे
भी
कम
में
तुम
ही
कैसे
मान
लोगे
जला
कर
राज़
सारे
तुम
भी
मेरी
जान
लोगे
Vishakt ki Kalam se
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कहानी
जानकर
मेरी
तुम्हें
क्या
हो
गया
था
मिला
तुमको
दुबारा
फिर
कहीं
जो
खो
गया
था
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मुझे
आज़ाद
कर
दो
रोज़
के
इस
मामले
से
अब
मुझे
अब
मौत
बख़्शो
जी
चुका
मैं
ज़िंदगी
अपनी
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