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Vishakt ki Kalam se
kisi ko zaar banna hai
kisi ko zaar banna hai | किसी को ज़ार बनना है
- Vishakt ki Kalam se
किसी
को
ज़ार
बनना
है
किसी
को
हार
बनना
है
किसी
को
आग
खानी
है
किसे
अंगार
बनना
है
किसी
का
सुर
नहीं
लगता
उसे
झंकार
बनना
है
हमारा
दिल
नहीं
लगता
हमें
टंकार
बनना
है
समूचे
विश्व
के
आगे
मुझे
ललकार
बनना
है
मुझे
ही
आग
खानी
है
मुझे
अंगार
बनना
है
लहू
से
खेलने
वाली
मुझे
तलवार
बनना
है
मुझे
भी
जीत
चखनी
है
किसी
की
हार
बनना
है
मुझे
आकाश
छूना
है
नहीं
बस
भार
बनना
है
मुझे
सब
वेद
पढ़ने
हैं
नहीं
बेकार
बनना
है
जगत
की
इस
कथा
का
अब
मुझे
ही
सार
बनना
है
मुझे
दुनिया
बदलनी
है
मुझे
औजार
बनना
है
नहीं
मानव
मुझे
रहना
मुझे
अवतार
बनना
है
- Vishakt ki Kalam se
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जलाकर
राख
कर
देता
सभी
को
तुझे
देखा
नहीं
होता
अभी
जो
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महीने
बाद
वो
कुछ
और
ही
था
उसे
मुझ
से
मिलाने
ग़ैर
लाए
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हवस
में
जीत
के
मैं
सौ
दफ़ा
हारा
हुआ
हूँ
नगर
की
धूप
वर्षा
धूल
का
मारा
हुआ
हूँ
मुझे
इस
जान
का
मालिक
न
समझो
लाश
हूँ
मैं
पसंदीदा
हमारे
फूल
का
मारा
हुआ
हूँ
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उजाले
को
निराला
बोलते
हैं
हज़ारों
का
हिबाला
खोलते
हैं
नशें
ने
हाथ
जोड़े
है
उन्हें
तो
उन्हीं
नज़रों
को
प्याला
बोलते
हैं
कईं
शायर
बनाएँ
हैं
उन्होंने
उन्हें
तो
सब
क़िताला
बोलते
हैं
हवा
भी
दूर
है
अब
उस
गली
से
गली
को
भी
रिज़ाला
बोलते
हैं
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दवा
ये
ज़हर
जैसी
लग
रही
है
उसी
के
हाथ
की
ख़ुशबू
है
इस
में
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