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Tarun Bharadwaj
saari nami ko sokh ke sehra ko tar kar doon
saari nami ko sokh ke sehra ko tar kar doon | सारी नमी को सोख के सहरा को तर कर दूँ
- Tarun Bharadwaj
सारी
नमी
को
सोख
के
सहरा
को
तर
कर
दूँ
बादल
बनूँ
तो
यूँँ
बनूँ
दरिया
को
तर
कर
दूँ
- Tarun Bharadwaj
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जो
उस
तरफ़
से
इशारा
कभी
किया
उस
ने
मैं
डूब
जाऊंगा
दरिया
को
पार
करते
हुए
Ghulam Murtaza Rahi
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शदीद
प्यास
थी
फिर
भी
छुआ
न
पानी
को
मैं
देखता
रहा
दरिया
तिरी
रवानी
को
Shahryar
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उतरी
हुई
नदी
को
समुंदर
कहेगा
कौन
सत्तर
अगर
हैं
आप
बहत्तर
कहेगा
कौन
पपलू
से
उनकी
बीवी
ने
कल
रात
कह
दिया
मैं
देखती
हूँ
आपको
शौहर
कहेगा
कौन
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Paplu Lucknawi
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ये
इश्क़
नहीं
आसाँ
इतना
ही
समझ
लीजे
इक
आग
का
दरिया
है
और
डूब
के
जाना
है
Jigar Moradabadi
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बीच
भँवर
से
कश्ती
कैसे
बच
निकली
बहुत
दिनों
तक
दरिया
भी
हैरान
रहा
Madan Mohan Danish
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बड़े
लोगों
से
मिलने
में
हमेशा
फ़ासला
रखना
जहाँ
दरिया
समुंदर
से
मिला
दरिया
नहीं
रहता
Bashir Badr
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तुम
ने
किया
है
तुम
ने
इशारा
बहुत
ग़लत
दरिया
बहुत
दुरुस्त
किनारा
बहुत
ग़लत
Nabeel Ahmed Nabeel
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इस
नदी
की
धार
में
ठंडी
हवा
आती
तो
है
नाव
जर्जर
ही
सही,
लहरों
से
टकराती
तो
है
Dushyant Kumar
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मैं
हूँ
सदियों
से
भटकता
हुआ
प्यासा
दरिया
ऐ
ख़ुदा
कुछ
तो
समुंदर
के
सिवा
दे
मुझ
को
Afzal Ali Afzal
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पुरानी
कश्ती
को
पार
लेकर
फ़क़त
हमारा
हुनर
गया
है
नए
खेवइये
कहीं
न
समझें
नदी
का
पानी
उतर
गया
है
Uday Pratap Singh
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सुनता
नहीं
ये
दिल
मेरी
कोई
भी
बात
अब
मुझ
सेे
ख़फ़ा
हुए
हैं
ये
दिन-और-रात
सब
कह
दे
कि
तेरी
सोच
में
मैं
इक
ख़याल
हूँ
कह
दे
तू
छोड़ती
हूँ
मैं
भी
तेरा
साथ
अब
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Tarun Bharadwaj
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परिंदे
उड़
गए
अब
सिर्फ़
शाख़
बाक़ी
है
शरीर
जल
गए
अब
सिर्फ़
राख़
बाक़ी
है
Tarun Bharadwaj
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जब
भी
मैंने
दिया
जलाया
है
नूर
में
उसके
तुमको
पाया
है
Tarun Bharadwaj
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वा’दा-ए-वस्ले-यार
ले
डूबा
फिर
मुझे
ऐ’तिबार
ले
डूबा
वस्ल
का
वक़्त
गुज़रा
लम्हों
में
हिज्र
का
इंतिज़ार
ले
डूबा
इस
क़दर
मय
पी
क़र्ज़
की
मैंने
आख़िरश
ये
उधार
ले
डूबा
आँखों
को
इंतिज़ार
है
उसका
बस
यही
रोज़गार
ले
डूबा
इक
अजब
इश्क़
की
ख़ुमारी
थी
मुझको
तेरा
ख़ुमार
ले
डूबा
आँखों
से
अश्क
तक
छलकते
नहीं
दर्द
पर
इख़्तियार
ले
डूबा
यार
पर
क्यूँ
यक़ीं
करे
‘ताहिर‘
यार
दरिया
के
पार
ले
डूबा
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Tarun Bharadwaj
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उस
जगह
इंक़िलाब
आते
रहे
वो
जहाँ
बे-नक़ाब
आते
रहे
आपकी
नीम-बाज़
आँखों
से
रिंद
पीने
शराब
आते
रहे
दीद
की
हसरतें
न
थी
दिल
में
क्यूँँॅं
तिरे
रोज़
ख़्वाब
आते
रहे
याद
का
चश्मा
रात
उतरा
जब
आँखों
में
धुँधले
ख़्वाब
आते
रहे
हाथ
काँटों
से
हो
गए
ज़ख़्मी
ख़त
में
सूखे
गुलाब
आते
रहे
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Tarun Bharadwaj
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