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SHIVANKIT TIWARI "SHIVA"
tumhaare saath yadi tum KHud khade ho
tumhaare saath yadi tum KHud khade ho | तुम्हारे साथ यदि तुम ख़ुद खड़े हो
- SHIVANKIT TIWARI "SHIVA"
तुम्हारे
साथ
यदि
तुम
ख़ुद
खड़े
हो
यक़ीं
मानों
कि
तुम
सब
सेे
बड़े
हो
विजेता
माने
जाओगे
सदा
ही
अगर
तुम
आख़िरी
दम
तक
लड़े
हो
- SHIVANKIT TIWARI "SHIVA"
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तू
उसके
दिल
में
जगह
चाहता
है
यार
जो
शख़्स
किसी
को
देता
नहीं
अपने
साथ
वाली
जगह
Umair Najmi
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वा'दा
करो
कि
हाथ
छुड़ाकर
न
जाओगे
वा'दा
करो
कि
सात
जनम
तक
रहेगा
इश्क़
Mukesh Jha
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इस
से
पहले
कि
तुझे
और
सहारा
न
मिले
मैं
तिरे
साथ
हूँ
जब
तक
मिरे
जैसा
न
मिले
Afkar Alvi
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मिले
किसी
से
गिरे
जिस
भी
जाल
पर
मेरे
दोस्त
मैं
उसको
छोड़
चुका
उसके
हाल
पर
मेरे
दोस्त
ज़मीं
पे
सबका
मुक़द्दर
तो
मेरे
जैसा
नहीं
किसी
के
साथ
तो
होगा
वो
कॉल
पर
मेरे
दोस्त
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Ali Zaryoun
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अच्छा
है
दिल
के
साथ
रहे
पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन
कभी
कभी
इसे
तन्हा
भी
छोड़
दे
Allama Iqbal
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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दर्द-ए-मुहब्बत
दर्द-ए-जुदाई
दोनों
को
इक
साथ
मिला
तू
भी
तन्हा
मैं
भी
तन्हा
आ
इस
बात
पे
हाथ
मिला
Abrar Kashif
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जानता
हूँ
कि
तुझे
साथ
तो
रखते
हैं
कई
पूछना
था
कि
तेरा
ध्यान
भी
रखता
है
कोई?
Umair Najmi
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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मैं
जंगलों
की
तरफ़
चल
पड़ा
हूँ
छोड़
के
घर
ये
क्या
कि
घर
की
उदासी
भी
साथ
हो
गई
है
Tehzeeb Hafi
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निरंतर
बातें
दोनों
कर
रहे
हैं,
इधर
झगड़ा
हमारा
चल
रहा
है,
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युगों
से
राम
पूजे
जा
रहे
हैं
युगों
से
सिर्फ़
रावण
जल
रहा
है
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जीवन
का
हर
मूल्य
चुकाना
पड़ता
है
आँसू
चीखें
दर्द
छुपाना
पड़ता
है
घर
पर
बैठे
मंज़िल
पाना
दुष्कर
है
उठकर
चलकर
बाहर
जाना
पड़ता
है
तुमको
तो
बस
वादे
करने
होते
है
हमको
पूरा
साथ
निभाना
पड़ता
है
अंदर
से
इक
जोकर
कितना
रोता
है
बाहर
सबको
उसे
हँसाना
पड़ता
है
ऐसे
रिश्ते
का
कोई
अस्तित्व
नहीं
हरदम
जिस
में
यक़ीं
दिलाना
पड़ता
है
इस
दुनिया
में
जो
कोई
भी
आता
है
उसको
दुनिया
छोड़
के
जाना
पड़ता
है
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सारे
ख़त
तस्वीर
जला
कर
बैठा
है
वो
सीने
में
आग
लगा
कर
बैठा
है
था
जिस
पर
विश्वास
उसे
ख़ुद
से
ज़्यादा
आज़
वही
इक
यार
दग़ा
कर
बैठा
है
मालूम
है
वो
उसे
नकारेगी
इक
दिन
फिर
भी
उस
सेे
इश्क़
लड़ा
कर
बैठा
है
मुश्किल
को
आसाँ
करने
के
चक्कर
में
अपनी
मुश्किल
स्वयं
बढ़ा
कर
बैठा
है
कोस
रहा
है
बस
क़िस्मत
को
बेचारा
वो
ख़ुद
घर
पर
खाट
बिछा
कर
बैठा
है
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ऐसे
रिश्ते
का
कोई
अस्तित्व
नहीं
हरदम
जिस
में
यक़ीं
दिलाना
पड़ता
है
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