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Sumit Panchal
karam bhi ham pe hue hain sitam bhi kya na hue
karam bhi ham pe hue hain sitam bhi kya na hue | करम भी हम पे हुए हैं सितम भी क्या न हुए
- Sumit Panchal
करम
भी
हम
पे
हुए
हैं
सितम
भी
क्या
न
हुए
मगर
जो
बाब
किसी
तौर
हम
पे
वा
न
हुए
- Sumit Panchal
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इसलिए
भी
छलक
मैं
जाता
हूँ
अपने
अंदर
नहीं
समाता
हूँ
यूँँ
तो
लायक़
नहीं
ग़ज़ल
इसके
आप
कहते
हैं
तो
सुनाता
हूँ
छोड़
पाता
नहीं
हूॅं
फिर
उस
को
अपनी
आदत
में
जिस
को
लाता
हूँ
मुझ
को
शायर
न
तुम
बता
देना
मैं
तो
बस
क़ाफ़िये
मिलाता
हूँ
देखता
हूँ
तमाम
दुनिया
को
इस
का
हासिल
अमल
में
लाता
हूँ
मौत
लेने
'सुमित'
मुझे
आई
आज
जीने
से
बाज़
आता
हूँ
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Sumit Panchal
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वो
दबे
पाँव
चला
जाएगा
जब
आएगा
और
मैं
सोचता
रहता
हूँ
वो
कब
आएगा
Sumit Panchal
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लुत्फ़
लेने
लगे
हैं
सब
मुझ
में
क्या
नज़र
आ
गया
है
अब
मुझ
में
एक
उस
के
सिवा
हैं
सब
मेरे
एक
मेरे
सिवा
हैं
सब
मुझ
में
मैं
तो
जीने
का
शौक़
रखता
था
हौसला
पर
नहीं
है
अब
मुझ
में
दर-ब-दर
हो
गया
हूँ
मैं
जब
से
कर
गई
घर
तेरी
तलब
मुझ
में
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Sumit Panchal
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टूट
जाना
बिखर
के
रह
जाना
अश्क
का
आँख
से
यूँँ
बह
जाना
Sumit Panchal
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खेल
जाता
है
जान
पर
कोई
जीत
जाता
है
हार
कर
कोई
रहने
लायक़
कहाँ
है
घर
कोई
जिस
में
दीवार
है
न
दर
कोई
काम
कोई
मेरे
नहीं
आता
काम
लेता
है
मुझ
से
हर
कोई
कुछ
न
मंज़िल
न
रास्ते
का
पता
और
दरपेश
है
सफ़र
कोई
मुझ
को
उड़ने
का
शौक़
जब
भी
हुआ
काट
देता
है
मेरे
पर
कोई
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Sumit Panchal
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