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Sumit Panchal
khel jaata hai jaan par koii
khel jaata hai jaan par koii | खेल जाता है जान पर कोई
- Sumit Panchal
खेल
जाता
है
जान
पर
कोई
जीत
जाता
है
हार
कर
कोई
रहने
लायक़
कहाँ
है
घर
कोई
जिस
में
दीवार
है
न
दर
कोई
काम
कोई
मेरे
नहीं
आता
काम
लेता
है
मुझ
से
हर
कोई
कुछ
न
मंज़िल
न
रास्ते
का
पता
और
दरपेश
है
सफ़र
कोई
मुझ
को
उड़ने
का
शौक़
जब
भी
हुआ
काट
देता
है
मेरे
पर
कोई
- Sumit Panchal
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ख़ुद
को
तस्लीम
कर
लिया
शायर
बस
मुझे
शा'इरी
नहीं
आती
Sumit Panchal
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नींद
प्यारी
है
मेरी
आँखों
को
ख़्वाब
सोने
मगर
नहीं
देते
Sumit Panchal
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दस्तरस
में
तो
मेरे
था
सब
कुछ
पर
गवारा
नहीं
किया
सब
कुछ
हश्र
का
दिन
अभी
सलामत
है
जानता
है
मेरा
ख़ुदा
सब
कुछ
कुछ
मेरे
पास
था
नहीं
लेकिन
उस
ने
माँगा
तो
दे
दिया
सब
कुछ
भूल
से
याद
कर
लिया
उसको
फिर
मुझे
याद
आ
गया
सब
कुछ
जल
रहा
था
चराग़
की
सूरत
बुझ
गया
दिल
तो
बुझ
गया
सब
कुछ
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Sumit Panchal
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ये
करूँँ,
वो
करूँँ,
क्या
करूँँ,
क्यूँँ
करूँँ?
छोड़
दूँ
सब
झमेले,
फ़क़त
यूँँ
करूँँ
Sumit Panchal
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हमारे
साथ
जो
होता
है
वो
होने
दिया
जाए
अगर
हम
रो
रहे
हैं
तो
हमें
रोने
दिया
जाए
Sumit Panchal
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