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SIDDHARTH SHARMA
use kya hi pata hogaa ibadat kis ko kahte hai
use kya hi pata hogaa ibadat kis ko kahte hai | उसे क्या ही पता होगा इबादत किस को कहते है
- SIDDHARTH SHARMA
उसे
क्या
ही
पता
होगा
इबादत
किस
को
कहते
है
मुझे
पूछा
जो
करती
थी
मोहब्बत
किस
को
कहते
है
सभी
वादें
सभी
क़स
में
सनम
निकले
महज़
क़िस्से
तसव्वुर
से
मैं
ने
सीखा
हक़ीक़त
किस
को
कहते
है
- SIDDHARTH SHARMA
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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ये
जो
है
फूल
हथेली
पे
इसे
फूल
न
जान
मेरा
दिल
जिस्म
से
बाहर
भी
तो
हो
सकता
है
Abbas Tabish
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तेरा
पीछा
करते
करते
जाने
क्यूँ
मैं
दुनियादारी
से
पीछे
छूट
गया
तूने
तो
ऐ
जान
महज़
दिल
तोड़ा
था
तू
क्या
जाने
मैं
अंदर
तक
टूट
गया
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Ritesh Rajwada
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हम
जान
से
जाएँगे
तभी
बात
बनेगी
तुम
से
तो
कोई
राह
निकाली
नहीं
जाती
Wasi Shah
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चुरायगा
उसी
से
आँख
क़ातिल
ज़रा
सी
जान
जिस
बिस्मिल
में
होगी
Dagh Dehlvi
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शाम-ए-फ़िराक़
अब
न
पूछ
आई
और
आ
के
टल
गई
दिल
था
कि
फिर
बहल
गया
जाँ
थी
कि
फिर
सँभल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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अजीब
हालत
है
जिस्म-ओ-जाँ
की
हज़ार
पहलू
बदल
रहा
हूँ
वो
मेरे
अंदर
उतर
गया
है
मैं
ख़ुद
से
बाहर
निकल
रहा
हूँ
Azm Shakri
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अभी
तो
जान
कहता
फिर
रहा
है
तू
तुझे
हम
हिज्र
वाले
साल
पूछेंगे
Parul Singh "Noor"
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बस
यूँँ
ही
मेरा
गाल
रखने
दे
मेरी
जान
आज
गाल
पर
अपने
Jaun Elia
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बनाने
वालों
ने
इक
बार
ढाला
छत
मेरी
माँ
रोज़
उठ
कर
घर
बनाती
है
माँ
दर्जा
ईश्वर
का
राम
को
देती
मेरे
कान्हा
को
भी
सुंदर
बनाती
है
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SIDDHARTH SHARMA
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पुरानी
फ़ोटो
उसकी
देखता
हूँ
मैं
नई
तस्वीर
आँखों
को
रुलाती
है
वो
मुझको
छोड़
कर
ऐसे
गई
'साहिर'
माँ
जैसे
छोड़
कर
बच्चे
को
जाती
है
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SIDDHARTH SHARMA
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कि
मुझ
सेे
जान
के
अनजान
बन
सकते
हो
बन
जाना
मेरी
तुम
दीद
के
मेहमान
बन
सकते
हो
बन
जाना
नहीं
है
फ़ायदे
का
सौदा
बे-बस
इश्क़
मेरी
जान
मगर
चाहो
तो
तुम
नुक़सान
बन
सकते
हो
बन
जाना
जिगर
ने
है
कहा
ये
इश्क़
दरिया
आग
का
'साहिर'
अगर
तुम
डूब
के
आसान
बन
सकते
हो
बन
जाना
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SIDDHARTH SHARMA
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जब
कभी
मैं
कहता
ख़ुद
को
फ़ुजू़ल
है
लड़की
डाँट
कर
माँ
कहती
सुन
एक
फूल
है
लड़की
चूम
कर
वो
आयत
बोली
लगाओ
रामायण
मैं
भी
जा
के
मंदिर
बोला
क़ुबूल
है
लड़की
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SIDDHARTH SHARMA
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शे'रों
को
आँखें
करना
हैं
मिसरों
में
पानी
भरना
हैं
जितने
हैं
पत्थर
दुनिया
में
उतने
ही
बस
दिल
करना
हैं
ग़ज़लों
में
जीना
है
हमको
पन्नों
में
जा
के
मरना
है
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SIDDHARTH SHARMA
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