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Shubham Vaishnav
tum kahii mujhse milo to mere KHvaabon ke siva
tum kahii mujhse milo to mere KHvaabon ke siva | तुम कहीं मुझ सेे मिलो तो मेरे ख़्वाबों के सिवा
- Shubham Vaishnav
तुम
कहीं
मुझ
सेे
मिलो
तो
मेरे
ख़्वाबों
के
सिवा
मेरे
आँगन
में
भी
सब
कुछ
है
गुलाबों
के
सिवा
दूर
से
सहरा
चमकता
दिखता
है
लेकिन
वहाँ
उस
जगह
कुछ
भी
नहीं
होता
सराबों
के
सिवा
मीर
ग़ालिब
फ़ैज़
साहिर
और
इक
वो
जौन
की
एक
शायर
क्या
ही
चाहे
इन
किताबों
के
सिवा
- Shubham Vaishnav
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फूल
कर
ले
निबाह
काँटों
से
आदमी
ही
न
आदमी
से
मिले
Khumar Barabankvi
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फूल
की
आँख
में
शबनम
क्यूँँ
है
सब
हमारी
ही
ख़ता
हो
जैसे
Bashir Badr
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फोन
भी
आया
तो
शिकवे
के
लिए
फूल
भी
भेजा
तो
मुरझाया
हुआ
Balmohan Pandey
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है
समझना
आपको
तो
शे'र
से
इज़हार
समझें
बात
कहने
को
भला
हम
फूल
क्यूँ
तोड़ा
करेंगे
Ankit Maurya
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मैं
अपने
बाप
के
सीने
से
फूल
चुनता
हूँ
सो
जब
भी
साँस
थमी
बाग़
में
टहल
आया
Hammad Niyazi
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तोहफ़ा,
फूल,
शिकायत,
कुछ
तो
लेकर
जा
इश्क़
से
मिलने
ख़ाली
हाथ
नहीं
जाते
Tanoj Dadhich
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हाथ
काँटों
से
कर
लिए
ज़ख़्मी
फूल
बालों
में
इक
सजाने
को
Ada Jafarey
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तुम्हें
ये
दुनिया
कभी
फूल
तो
नहीं
देगी
मिले
हैं
काँटे
तो
काँटों
को
ही
गुलाब
करो
Madan Mohan Danish
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गुलाबों
के
होंटों
पे
लब
रख
रहा
हूँ
उसे
देर
तक
सोचना
चाहता
हूँ
Zubair Rizvi
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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कैसी
उल्फ़त
बन
गई
ये
कैसी
आदत
बन
गई
मेरी
अच्छी
दोस्त
ही
मेरी
मुहब्बत
बन
गई
आज
कल
मेरी
ग़ज़ल
में
ज़िक्र
उसका
होता
है
आज
कल
मेरी
ग़ज़ल
भी
ख़ूब-सूरत
बन
गई
फिर
मुहब्बत
फिर
मुहब्बत
फिर
मुहब्बत
ही
तो
की
ये
मुहब्बत
ही
'शुभम'
तेरी
मुसीबत
बन
गई
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Shubham Vaishnav
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इस
तरह
शा'इरी
का
असर
हो
गया
खुशनुमा
ज़िंदगी
का
सफ़र
हो
गया
मिल
गई
चाँद
की
रौशनी
जब
उसे
इक
नया
पौधा
पूरा
शजर
हो
गया
यार
संगीत
इतना
सरल
भी
नहीं
तान
इक
सीखते
रात
भर
हो
गया
बाद
सर्दी
यहाँ
फिर
ज़ियादा
लगी
मेरा
कंबल
इधर
से
उधर
हो
गया
चाय
मीठी
बनी
और
अच्छी
बनी
देखते
सीखते
यह
हुनर
हो
गया
मैं
उसे
फिर
कभी
चूम
लूँगा
कहीं
पास
वो
पहले
जैसे
अगर
हो
गया
दिल
नहीं
लग
रहा
है
किसी
से
'शुभम'
कैसा
था
कैसा
तेरा
जिगर
हो
गया
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ये
मत
पूछो
कि
उस
में
और
क्या-क्या
देखता
हूॅं
उसी
इक
शख़्स
में
मैं
अपनी
दुनिया
देखता
हूॅं
कभी
आँखें
कभी
चेहरा
कभी
लब
तो
कभी
तिल
कि
दिल
भरता
नहीं
मैं
उसको
जितना
देखता
हूॅं
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Shubham Vaishnav
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अब
तो
अच्छी
चल
रही
है
ज़िंदगी
थोड़ी
बहुत
हम
को
भी
आने
लगी
है
शा'इरी
थोड़ी
बहुत
Shubham Vaishnav
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हमारी
ग़ज़ल
बहर
में
है
हवा
की
चली
लहर
में
है
किसी
ने
हमें
ये
ख़बर
दी
यहीं
वो
इसी
शहर
में
है
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Shubham Vaishnav
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