रातकीतुमचाँदनीमहताबहोतुम
तुमहक़ीक़तऔरमेराख़्वाबहोतुम
गर्मसहरासायहाँतपताहुआमैं
नर्मगुलशनसीवहाँशादाबहोतुम
झीलजैसीतुमकभीठहरीहुईसी
फिरकभीतोलगताहैसैलाबहोतुम
इनहवाओंमेंकिसीधुनकीतरहमैं
गुनगुनातेसाज़कीमिज़राबहोतुम
क्यूँँदिल-ए-नादाँसमझपातानहींकुछ
क्यूँँ‘शुभम’किसकेलिएबे-ताबहोतुम