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shaan manral
mujhe qaraar ke aalam ka intizaar nahin
mujhe qaraar ke aalam ka intizaar nahin | मुझे क़रार के आलम का इंतिज़ार नहीं
- shaan manral
मुझे
क़रार
के
आलम
का
इंतिज़ार
नहीं
कोई
जो
हँस
के
मिला
मिल
गया
क़रार
मुझे
- shaan manral
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उस
वक़्त
इंतिज़ार
का
आलम
न
पूछिए
जब
कोई
बार
बार
कहे
आ
रहा
हूँ
मैं
Unknown
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तू
वो
बहार
जो
अपने
चमन
में
आवारा
मैं
वो
चमन
जो
बहाराँ
के
इंतिज़ार
में
है
Ali Sardar Jafri
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उम्र-ए-दराज़
माँग
के
लाई
थी
चार
दिन
दो
आरज़ू
में
कट
गए
दो
इंतिज़ार
में
Seemab Akbarabadi
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शब-ए-इंतिज़ार
की
कश्मकश
में
न
पूछ
कैसे
सहर
हुई
कभी
इक
चराग़
जला
दिया
कभी
इक
चराग़
बुझा
दिया
Majrooh Sultanpuri
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अब
जो
पत्थर
है
आदमी
था
कभी
इस
को
कहते
हैं
इंतिज़ार
मियाँ
Afzal Khan
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माना
कि
तेरी
दीद
के
क़ाबिल
नहीं
हूँ
मैं
तू
मेरा
शौक़
देख
मिरा
इंतिज़ार
देख
Allama Iqbal
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वो
दूर
मुझ
सेे
जब
हुआ
रोकर
नहीं
हुआ
तो
मैं
भी
इंतिज़ार
में
पत्थर
नहीं
हुआ
दुनिया
को
ज़हर
पी
के
बचाओ
तो
बात
है
बस
भांग
पी
के
कोई
भी
शंकर
नहीं
हुआ
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Tanoj Dadhich
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जानता
है
कि
वो
न
आएँगे
फिर
भी
मसरूफ़-ए-इंतिज़ार
है
दिल
Faiz Ahmad Faiz
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न
कोई
वा'दा
न
कोई
यक़ीं
न
कोई
उमीद
मगर
हमें
तो
तिरा
इंतिज़ार
करना
था
Firaq Gorakhpuri
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कहाँ
है
तू
कि
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐ
दोस्त
तमाम
रात
सुलगते
हैं
दिल
के
वीराने
Nasir Kazmi
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ये
तय
है
कि
उसे
मैं
हरगिज़
भूल
नहीं
पाऊँगा
पर
अपने
लोगों
को
समझा
सकता
हूँ
कि
उस
का
ज़िक्र
न
हो
shaan manral
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तुम
को
भी
मेरा
रोग
न
लग
जाए
चारा-गर
तो
मुझ
को
मेरे
हाल
पे
ही
छोड़
दीजिए
shaan manral
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इसे
तो
वक़्त
की
आब-ओ-हवा
ही
ठीक
कर
देगी
मियाँ
नासूर
होते
ज़ख़्म
सहलाया
नहीं
करते
shaan manral
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शहर
में
आज
हादसा
हो
गया
इक
भला
आदमी
बुरा
हो
गया
आइने
में
अभी
अभी
ख़ुद
को
देख
ख़ूब
रोया
कि
क्या
था
क्या
हो
गया
मैं
तिरे
साथ
चल
रहा
था
और
फिर
मिरे
साथ
हादसा
हो
गया
आप
ही
ठीक
हो
ग़लत
मैं
हूँ
कितनी
जल्दी
ये
फ़ैसला
हो
गया
हम
तो
इंसान
भी
न
बन
पाए
आज
फिर
एक
बुत
ख़ुदा
हो
गया
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shaan manral
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ये
ग़ज़ल
नज़्म
कैसे
कहता
मैं
जो
मोहब्बत
हुई
नहीं
होती
shaan manral
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