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Shams Amiruddin
daulat bhi shohrat bhi nichhawar tujh pe sab
daulat bhi shohrat bhi nichhawar tujh pe sab | दौलत भी शोहरत भी निछावर तुझ पे सब
- Shams Amiruddin
दौलत
भी
शोहरत
भी
निछावर
तुझ
पे
सब
रस्म-ए-मोहब्बत
तुम
निभाओ
तो
सही
- Shams Amiruddin
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पेड़
मुझे
हसरत
से
देखा
करते
थे
मैं
जंगल
में
पानी
लाया
करता
था
Tehzeeb Hafi
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दिल-लगी
में
हसरत-ए-दिल
कुछ
निकल
जाती
तो
है
बोसे
ले
लेते
हैं
हम
दो-चार
हँसते
बोलते
Munshi Amirullah Tasleem
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दौलत
शोहरत
बीवी
बच्चे
अच्छा
घर
और
अच्छे
दोस्त
कुछ
तो
है
जो
इन
के
बाद
भी
हासिल
करना
बाक़ी
है
कभी-कभी
तो
दिल
करता
है
चलती
रेल
से
कूद
पड़ूॅं
फिर
कहता
हूॅं
पागल
अब
तो
थोड़ा
रस्ता
बाक़ी
है
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Zia Mazkoor
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अब
मैं
समझा
तिरे
रुख़्सार
पे
तिल
का
मतलब
दौलत-ए-हुस्न
पे
दरबान
बिठा
रक्खा
है
Qamar Moradabadi
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आज
फिर
दिल
में
तिरे
दीद
की
हसरत
जागी
काश
फिर
काम
कोई
तुझ
से
ज़रूरी
निकले
Nilofar Noor
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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गाहे
गाहे
की
मुलाक़ात
ही
अच्छी
है
'अमीर'
क़द्र
खो
देता
है
हर
रोज़
का
आना
जाना
Ameer Minai
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उसे
तो
दौलत-ए-दुनिया
भी
कम
भी
पाने
को
मिरी
तो
ज़ात
का
मीज़ान
भी
ज़ियादा
नहीं
Vipul Kumar
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कभी
तो
मुझे
छोड़
जाओगे
तुम
भी
कहोगे
मुझे
अब
कि
फुर्सत
नहीं
है
भला
इस
तरह
क्यूँ
सताने
लगे
हो
कहीं
छोड़
जाने
की
हसरत
नहीं
है
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Tiwari Jitendra
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इक
ख़ता
पर
मिरी
ख़फ़ा
हो
गए
दिखा
कर
ख़्वाब
वो
जुदा
हो
गए
रूठ
कर
बिछड़े
इस
तरह
से
वो
इश्क़
में
यार
भी
ख़ुदा
हो
गए
बे-वफ़ा
लड़की
की
मोहब्बत
में
देख
लो
हम
भी
क्या
से
क्या
हो
गए
लोग
क्या
अपने
भी
मुसीबत
में
वक़्त
के
रहते
गुम-शुदा
हो
गए
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Shams Amiruddin
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तमन्ना
थी
तेरे
साथ
देखूँ
मैं
शहर
तेरा
मगर
समुंदर
के
शोर
में
ख़ुद
को
तन्हा
पाया
Shams Amiruddin
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यूँँ
जो
उनका
एक
पैग़ाम
आ
गया
डाकिया
लेकर
सर-ए-आम
आ
गया
लिख
के
उस
ने
है
बताया
इस
दफ़ा
इसलिए
ख़त
इक
मिरे
नाम
आ
गया
बाँध
लो
तुम
सारा
सामान-ए-सफ़र
यार
का
मेरे
ये
अहकाम
आ
गया
क्या
हुआ
तुम
पूछते
हो
फिर
सुनो
इश्क़
का
मेरे
है
अंजाम
आ
गया
कर
लो
तैयारी
चलो
अब
हम
चलें
इश्क़-ए-फ़ानी
में
है
आलाम
आ
गया
है
पसंदीदा
ये
मौसम
उनका
सो
कर
रही
हैं
शादी
पैग़ाम
आ
गया
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Shams Amiruddin
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अहद-ए-वफ़ा
और
झूट
मैं
सब
सीख
लूँ
रस्म-ए-मोहब्बत
तुम
सिखाओ
तो
सही
Shams Amiruddin
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मोहब्बत
जो
समझते
हैं
वहीं
हम
को
समझते
हैं
फ़क़त
अब
हम
हक़ीकत
भी
यूँँ
ख़्वाबों
को
समझते
हैं
भले
को
बस
भला
जाने
बुरे
सब
को
समझते
हैं
फ़लक
के
चाँद
तारे
अब
सभी
उनको
समझते
हैं
कहो
गर
वो
मिरे
हैं
तो
मुझे
क्या
वो
समझते
हैं
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Shams Amiruddin
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