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Shams Amiruddin
mohabbat jo samajhte hain
mohabbat jo samajhte hain | मोहब्बत जो समझते हैं
- Shams Amiruddin
मोहब्बत
जो
समझते
हैं
वहीं
हम
को
समझते
हैं
फ़क़त
अब
हम
हक़ीकत
भी
यूँँ
ख़्वाबों
को
समझते
हैं
भले
को
बस
भला
जाने
बुरे
सब
को
समझते
हैं
फ़लक
के
चाँद
तारे
अब
सभी
उनको
समझते
हैं
कहो
गर
वो
मिरे
हैं
तो
मुझे
क्या
वो
समझते
हैं
- Shams Amiruddin
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ज़िंदगी
ये
थी
जिसके
लिए
तुम
ही
तुम
थी
वो
मेरे
लिए
क्या
ज़माना
था
वो
तुम
भी
जब
माँगे
थे
ख़ुद
को
मेरे
लिए
मुद्दतों
से
कई
मैंने
भी
जो
किया
कुछ
न
तेरे
लिए
इक
दु'आ
माँगी
है
इसलिए
ख़ुश
रहो
तुम
सदा
के
लिए
माँग
लो
तुम
ख़ुदास
कभी
अब
दु'आ
एक
ख़ुद
के
लिए
हो
भी
पूरी
ये
ख़्वाहिश
तिरी
जो
मैं
मर
जाऊँ
तेरे
लिए
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Shams Amiruddin
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मैं
एक
रोज़
ख़ुद
को
ऐसा
बनाऊँगा
ओ
खोने
वाले
तुझ
को
फिर
याद
आऊँगा
आती
है
इस
क़दर
मुझ
को
याद
गाँव
की
तुम
देखना
किसी
दिन
मैं
लौट
आऊँगा
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चाहूँ
मैं
तो
भी
नहीं
टलती
बला
इक
इस
तरह
से
मुझ
में
है
उलझी
बला
इक
चाहती
है
जब
मसल
देती
है
मुझ
को
मेरे
अंदर
सदियों
से
पलती
बला
इक
शाम
ढ़लते
ही
निकल
आता
हूँ
पीने
यूँँ
है
मुझ
में
फूलती-फलती
बला
इक
चलते-चलते
लड़खड़ा
जाता
हूँ
अक्सर
जब
मचलती
है
मिरी
प्यासी
बला
इक
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Shams Amiruddin
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अहद-ए-वफ़ा
और
झूट
मैं
सब
सीख
लूँ
रस्म-ए-मोहब्बत
तुम
सिखाओ
तो
सही
Shams Amiruddin
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इश्क़
मेरा
बन
गया
है
जब
इबादत
फिर
मैं
देखूँ
क्यूँ
ही
बिगड़ी
अपनी
हालत
लोग
कहते
है
तो
कहने
दो
न
उनको
उनके
कुछ
कहने
पे
क्यूँ
करते
हो
हैरत
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