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Shajar Abbas
abhii bhi jaal men uljha hua hai raavan ke
abhii bhi jaal men uljha hua hai raavan ke | अभी भी जाल में उलझा हुआ है रावण के
- Shajar Abbas
अभी
भी
जाल
में
उलझा
हुआ
है
रावण
के
कहाँ
ज़माने
का
इंसान
राम
तक
पहुँचा
- Shajar Abbas
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इश्क़
क़ैस
फ़रहाद
रोमियो
जैसे
ही
कर
सकते
हैं
हम
तो
ठहरे
दस
से
छह
तक
ऑफ़िस
जाने
वाले
लोग
Vashu Pandey
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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क्या
लोग
हैं
कि
दिल
की
गिरह
खोलते
नहीं
आँखों
से
देखते
हैं
मगर
बोलते
नहीं
Akhtar Hoshiyarpuri
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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इसी
लिए
तो
यहाँ
अब
भी
अजनबी
हूँ
मैं
तमाम
लोग
फ़रिश्ते
हैं
आदमी
हूँ
मैं
Bashir Badr
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यार
तस्वीर
में
तन्हा
हूँ
मगर
लोग
मिले
कई
तस्वीर
से
पहले
कई
तस्वीर
के
बा'द
Umair Najmi
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मैं
चीख़ता
रहा
कुछ
और
भी
है
मेरा
इलाज
मगर
ये
लोग
तुम्हारा
ही
नाम
लेते
रहे
Anjum Saleemi
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फ़ुज़ूल-ख़र्ची
नहीं
करेंगे
Rehman Faris
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रफ़्ता
रफ़्ता
सब
कुछ
समझ
गया
हूँ
मैं
लोग
अचानक
टैरेस
से
क्यूँ
कूद
गए
Shadab Asghar
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दस
बरस
से
मुस्तक़िल
शाम-ओ-सहर
जल
रहा
हूँ
ज़िंदगी
की
आग
में
Shajar Abbas
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हमने
उस
शख़्स
की
ख़ुशी
के
लिए
अपनी
ख़ुशियों
को
तर्क
कर
डाला
Shajar Abbas
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जश्न
है
फ़र्श
पे
यूँँ
हिन्द
के
शहज़ादों
ने
परचम-ए-हिन्द
को
महताब
पे
लहराया
है
Shajar Abbas
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कि
ख़ुश
नसीबों
को
होता
है
गुल
का
बोसा
नसीब
तुम्हारे
बोसे
की
क्यूँ
बदनसीब
चाह
करें
Shajar Abbas
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अब
वो
सूरत
नज़र
नहीं
आती
आँख
क्यूँ
मेरी
भर
नहीं
आती
दिल
के
दरिया
में
क्यूँ
मोहब्बत
की
अब
कोई
भी
लहर
नहीं
आती
फिर
रही
है
शहर
में
भटकी
हुई
क्यूँ
ख़ुशी
मेरे
घर
नहीं
आती
यार
मैं
तो
मरीज़-ए-इश्क़
नहीं
'नींद
क्यूँ
रात
भर
नहीं
आती'
गुल
की
रग
से
टपक
रहा
है
लहू
ख़ार
की
चश्म-ए-तर
नहीं
आती
जिसका
मैं
मुंतज़िर
हूँ
बरसों
से
क्यूँ
ख़ुदा
वो
सहर
नहीं
आती
या
इलाही
हो
ख़ैर
क़ासिद
की
उनकी
अब
कुछ
ख़बर
नहीं
आती
आबले
ज़ेरे
पा
निकल
आए
और
मंज़िल
नज़र
नहीं
आती
मैं
मुसलसल
सदाएँ
देता
हूँ
और
सदा
लौट
कर
नहीं
आती
दिल
नहीं
रहता
संग
हो
जाता
आह
इस
से
अगर
नहीं
आती
शा'इरी
करते
हो
सही
है
'शजर'
पर
तुम्हें
ख़ूब
तर
नहीं
आती
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Shajar Abbas
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