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Shajar Abbas
vo jis jis ka bhi hamdam ho raha hai
vo jis jis ka bhi hamdam ho raha hai | वो जिस जिस का भी हमदम हो रहा है
- Shajar Abbas
वो
जिस
जिस
का
भी
हमदम
हो
रहा
है
हर
इक
बन्दा
वो
मोहकम
हो
रहा
है
ग़ज़ल
में
दर्द
अपना
लिख
रहा
हूँ
तो
मेरा
दर्द
कुछ
कम
हो
रहा
है
शब-ए-महताब
ये
क्या
माजरा
है
रूख़-ए-महताब
मद्धम
हो
रहा
है
जो
ख़म
होता
न
था
आगे
किसी
के
तेरे
आगे
वो
सर
ख़म
हो
रहा
है
ये
मेरा
दिल
नहीं
धड़के
है
पागल
तेरी
फ़ुर्क़त
का
मातम
हो
रहा
है
हमारे
दोस्तों
में
अक़रिबा
में
तुम्हारा
ज़िक्र
हर
दम
हो
रहा
है
वो
अपनी
ज़ुल्फ़
को
लहरा
रही
है
हसीं
यूँँ
आज
मौसम
हो
रहा
है
ज़माना
देख
के
हैरत
ज़दा
है
मेरा
दुश्मन
क्यूँँ
हमदम
हो
रहा
है
मता-ए-जाँ
तुम्हारा
मुस्कुराना
मेरे
ज़ख़्मों
का
मरहम
हो
रहा
है
क़दम
जिस
आब
में
वो
रख
रही
है
शजर
वो
आब-ए-ज़मज़म
हो
रहा
है
- Shajar Abbas
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ये
शाम
ख़ुशबू
पहन
के
तेरी
ढली
है
मुझ
में
जो
रेज़ा
रेज़ा
मैं
क़तरा
क़तरा
पिघल
रही
हूँ
ख़मोश
शब
के
समुंदरों
में
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Kiran K
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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आज
भी
शायद
कोई
फूलों
का
तोहफ़ा
भेज
दे
तितलियाँ
मंडला
रही
हैं
काँच
के
गुल-दान
पर
Shakeb Jalali
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बंद
कमरा,
सर
पे
पंखा,
तीरगी
है
और
मैं
एक
लड़ाई
चल
रही
है
ज़िंदगी
है
औऱ
मैं
Shadab Asghar
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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'अंजुम'
तुम्हारा
शहर
जिधर
है
उसी
तरफ़
इक
रेल
जा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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ज़िंदगी
उजड़े
हुए
घर
की
तरह
लगती
है
बाप
का
साया
अगर
सर
पे
नहीं
होता
है
Shajar Abbas
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देखना
इक़बाल-ओ-जौन-ओ-मीर-ओ-ग़ालिब
की
तरह
हम
भी
जाने
जाएँगे
दुनिया
में
यारों
एक
दिन
Shajar Abbas
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जनाब-ए-क़ैस
की
मय्यत
उठा
के
लाओ
ज़रा
हमें
ये
देखना
हैं
कितने
ज़ख़्म
थे
दिल
पर
Shajar Abbas
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फिर
मिटा
दूँगा
हर
कुदूरत
को
दिल
को
मैं
अपने
साफ़
कर
दूँगा
Shajar Abbas
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मैं
चुप
हूँ
यार
सो
चुप
रहने
दे
ख़ुदा
के
लिए
ज़बाँ
खुलेगी
तो
लफ़्ज़ों
से
ख़ून
टपकेगा
Shajar Abbas
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