koi mazloom pe jab zulm-o-sitam dhaata hai | कोई मज़लूम पे जब ज़ुल्म-ओ-सितम ढाता है

  - Shajar Abbas
कोईमज़लूमपेजबज़ुल्म-ओ-सितमढाताहै
काँपउठतीहैज़मींआसमाँथर्राताहै
गुलअगरशाख़-ए-शजरपरकोईमुरझाताहै
तितलियाँरोतीहैंऔरबाग़बाँग़मखाताहै
देखकरहज़रत-ए-दिलइसतरहग़मगीनतुम्हें
ख़ुद-कुशीकरनेकाबसमनमेंख़यालआताहै
तुमनेजातेहुएचूमाथाजोगुलकाग़ज़का
आजतककमरेकोवोगुलमेरेमहकाताहै
सबहक़ीक़तहैजोयारोंसेसुनाहैमैंने
नामसुनकरवोमेराआजभीशरमाताहै
पहलेपढ़ताथामोहब्बतकेक़सीदेवोजवाँ
औरअबलफ़्ज़-ए-मोहब्बतभीघबराताहै
ख़ुदाइसदिल-ए-नादाँकोसँभालूँकैसे
हुस्नकोदेखकेपागलयेमचलजाताहै
मैंख़यालोंमेंतेरीआँखोंकेखोजाताहूँ
जामजबसाक़ीकभीसामनेछलकाताहै
नेकीकरनेपेज़मानेमेंबदीमिलतीहै
अपनीनेकीकाकहाँकोईसिलापाताहै
शिद्दत-ए-दर्दसेवोचीख़नेलगताहैशजर
गरकोईनेज़ामेरेसीनेसेटकराताहै
बिनतेरेदीदकेमछलीसीतड़पतीहैंशजर
दीदकरकेतिराआँखोंकोसुकूँआताहै
  - Shajar Abbas
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