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Shadab Shabbiri
kuchh tabiyat mirii bezaar agar hai to hai
kuchh tabiyat mirii bezaar agar hai to hai | कुछ तबीयत मिरी बेज़ार अगर है तो है
- Shadab Shabbiri
कुछ
तबीयत
मिरी
बेज़ार
अगर
है
तो
है
सर
पे
लटकी
हुई
तलवार
अगर
है
तो
है
- Shadab Shabbiri
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इस
मरज़
से
कोई
बचा
भी
है
चारा-गर
इश्क़
की
दवा
भी
है
Unknown
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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दर्द
मिन्नत-कश-ए-दवा
न
हुआ
मैं
न
अच्छा
हुआ
बुरा
न
हुआ
Mirza Ghalib
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हाँ
ठीक
है
मैं
अपनी
अना
का
मरीज़
हूँ
आख़िर
मिरे
मिज़ाज
में
क्यूँँ
दख़्ल
दे
कोई
Jaun Elia
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भारत
के
उपकार
को,
मान
रहे
सब
लोग
रोग
'घटाने'
के
लिए,
दिया
विश्व
को
'योग'
Divy Kamaldhwaj
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हम
हैं
रहे-उम्मीद
से
बिल्कुल
परे
परे
अब
इंतज़ार
आपका
कोई
करे!
करे!
मैंने
तो
यूँँ
ही
अपनी
तबीयत
सुनाई
थी
तुम
तो
लगीं
सफाइयाँ
देने,
अरे!
अरे!
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Balmohan Pandey
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ये
मुझे
नींद
में
चलने
की
जो
बीमारी
है
मुझ
को
इक
ख़्वाब-सरा
अपनी
तरफ़
खींचती
है
Shahid Zaki
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बीमार
को
मरज़
की
दवा
देनी
चाहिए
मैं
पीना
चाहता
हूँ
पिला
देनी
चाहिए
Rahat Indori
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बैठे
बिठाए
हम
को
सनम
याद
आ
गए
फिर
उन
के
साथ
उन
के
करम
याद
आ
गए
कोई
जो
राह
चलते
अचानक
मिला
मियाँ
हम
को
हर
एक
रंज-ओ-अलम
याद
आ
गए
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shaan manral
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चारागरी
की
बात
किसी
और
से
करो
अब
हो
गए
हैं
यारो
पुराने
मरीज़
हम
Shuja Khawar
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थी
किताबी
किताब
में
गुज़री
ज़िन्दगी
सारी
ख़्वाब
में
गुज़री
उसके
दरबार
से
रहा
रिश्ता
उम्र
बस
जी
जनाब
में
गुज़री
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Shadab Shabbiri
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यूँँ
तो
कोई
भी
बे-लिबास
न
था
फिर
भी
लगता
था
बे-लिबासी
थी
उस
से
मिल
कर
ख़ुशी
हुई
थी
मुझे
और
फिर
देर
तक
उदासी
थी
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Shadab Shabbiri
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दिल
के
ज़ख़्मों
को
इंदिमाल
नहीं
फिर
भी
मैं
दर्द
से
निढाल
नहीं
हम
ने
जब
कह
दिया
कि
हाँ
तो
हाँ
अब
नहीं
का
कोई
सवाल
नहीं
सिर्फ़
ख़ुशियाँ
ही
ज़द
पे
आती
हैं
रंज-ओ-ग़म
पर
मिरे
ज़वाल
नहीं
उसकी
सूरत
कई
से
मिलती
है
उसकी
सीरत
की
ही
मिसाल
नहीं
मुझको
वादों
पे
टाल
देते
हो
क्या
तुम्हें
कुछ
मिरा
ख़याल
नहीं
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Shadab Shabbiri
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तफ़क्कुरात
का
मौसम
गुज़रने
वाला
है
ग़मों
से
चूर
था
जो
शख़्स
मरने
वाला
है
Shadab Shabbiri
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ब-कसरत
चायनोशी
के
सबब
ही
मिरी
तासीर
ठंडी
हो
गई
है
Shadab Shabbiri
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