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Shadab Shabbiri
KHud ko KHud kii hi nazar se tu bachaana jaanaan
KHud ko KHud kii hi nazar se tu bachaana jaanaan | ख़ुद को ख़ुद की ही नज़र से तू बचाना जानाँ
- Shadab Shabbiri
ख़ुद
को
ख़ुद
की
ही
नज़र
से
तू
बचाना
जानाँ
तुझ
को
तेरी
ही
नज़र
लग
गई
तो
क्या
होगा
- Shadab Shabbiri
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कबूतर
इश्क़
का
उतरे
तो
कैसे?
तुम्हारी
छत
पे
निगरानी
बहुत
है
इरादा
कर
लिया
गर
ख़ुद-कुशी
का
तो
ख़ुद
की
आँख
का
पानी
बहुत
है
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Kumar Vishwas
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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कमाल
ये
है
मुझे
देखती
हैं
वो
आँखें
मलाल
ये
है
उन्हें
देखना
नहीं
आता
Dilawar Ali Aazar
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मंज़िलों
का
कौन
जाने
रहगुज़र
अच्छी
नहीं
उसकी
आँखें
ख़ूब-सूरत
है
नज़र
अच्छी
नहीं
Abrar Kashif
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मुँह
ज़र्द-ओ-आह-ए-सर्द
ओ
लब-ए-ख़ुश्क
ओ
चश्म-ए-तर
सच्ची
जो
दिल-लगी
है
तो
क्या
क्या
गवाह
है
Nazeer Akbarabadi
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ये
भी
मुमकिन
है
मियाँ
आँख
भिगोने
लग
जाऊँ
वो
कहे
कैसे
हो
तुम
और
मैं
रोने
लग
जाऊँ
ऐ
मेरी
आँख
में
ठहराए
हुए
वस्ल
के
ख़्वाब
मैं
तवातुर
से
तेरे
साथ
न
सोने
लग
जाऊँ
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Ejaz Tawakkal Khan
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सुब्ह-ए-मग़रूर
को
वो
शाम
भी
कर
देता
है
शोहरतें
छीन
के
गुमनाम
भी
कर
देता
है
वक़्त
से
आँख
मिलाने
की
हिमाकत
न
करो
वक़्त
इंसान
को
नीलाम
भी
कर
देता
है
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Nadeem Farrukh
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मुयस्सर
हमें
ख़्वाब-ओ-राहत
कहाँ
ज़रा
आँख
झपकी
सहर
हो
गई
Dagh Dehlvi
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निगाह-ए-शोख़
का
क़ैदी
नहीं
है
कौन
यहाँ
किसे
तमन्ना
नहीं
फूल
चूमने
को
मिले
Aks samastipuri
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देर
तक
आँख
मुसीबत
में
पड़ी
रहती
है
तुम
चले
जाते
हो,
तस्वीर
बनी
रहती
है
Fauziya Rabab
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कुछ
तबीयत
मिरी
बेज़ार
अगर
है
तो
है
सर
पे
लटकी
हुई
तलवार
अगर
है
तो
है
Shadab Shabbiri
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तेरे
शक़
को
यक़ीं
में
बदलूँगा
आसमाँ
को
ज़मीं
में
बदलूँगा
Shadab Shabbiri
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अपनी
बर्बादी
का
ऐलान
करूँँगा
इक
दिन
देख
लेना
तुझे
हैरान
करूँँगा
इक
दिन
Shadab Shabbiri
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तेरे
दर
पर
तो
हम
खड़े
भी
नहीं
यार
इतने
गिरे
पड़े
भी
नहीं
मान
ली
है
शिकस्त
दुनिया
ने
जब
कि
उस
सेे
कभी
लड़े
भी
नहीं
जिस
तरफ़
भी
चले
चले
ही
गए
हम
इधर
या
उधर
मुड़े
भी
नहीं
आप
छोटे
नहीं
हक़ीक़त
है
आप
लेकिन
बहुत
बड़े
भी
नहीं
सर-निगूँ
हो
गए
हैं
वो
ख़ुद
ही
हम
तो
ज़िद
पर
कभी
अड़े
भी
नहीं
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Shadab Shabbiri
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जनवरी
माह
देखने
के
लिए
हम
गुज़ारे
गए
दिसम्बर
से
Shadab Shabbiri
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