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Shadab Shabbiri
jisko dukh dard ho na uljhan ho
jisko dukh dard ho na uljhan ho | जिसको दुख दर्द हो न उलझन हो
- Shadab Shabbiri
जिसको
दुख
दर्द
हो
न
उलझन
हो
कोई
ऐसा
भी
इस
जहान
में
है
- Shadab Shabbiri
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अब
शहर
की
थकावट
बेचैन
कर
रही
है
अब
शाम
हो
गई
है
चल
माँ
से
बात
कर
लें
Akash Rajpoot
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ऐ
दिल
की
ख़लिश
चल
यूँँही
सही
चलता
तो
हूँ
उन
की
महफ़िल
में
उस
वक़्त
मुझे
चौंका
देना
जब
रंग
पे
महफ़िल
आ
जाए
Behzad Lakhnavi
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फ़िराक़-ए-यार
ने
बेचैन
मुझ
को
रात
भर
रक्खा
कभी
तकिया
इधर
रक्खा
कभी
तकिया
उधर
रक्खा
Ameer Minai
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वो
तड़प
जाए
इशारा
कोई
ऐसा
देना
उस
को
ख़त
लिखना
तो
मेरा
भी
हवाला
देना
Azhar Inayati
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उसको
नंबर
देके
मेरी
और
उलझन
बढ़
गई
फोन
की
घंटी
बजी
और
दिल
की
धड़कन
बढ़
गई
Ana Qasmi
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मैं
पा
सका
न
कभी
इस
ख़लिश
से
छुटकारा
वो
मुझ
से
जीत
भी
सकता
था
जाने
क्यूँँ
हारा
Javed Akhtar
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तड़पना
हिज्र
तक
सीमित
नहीं
है
उसे
दुल्हन
भी
बनते
देखना
है
Anand Verma
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कोई
दीवाना
कहता
है
कोई
पागल
समझता
है
मगर
धरती
की
बेचैनी
को
बस
बादल
समझता
है
Kumar Vishwas
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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किसी
की
तपिश
में
ख़ुशी
है
किसी
की
किसी
की
ख़लिश
में
मज़ा
है
किसी
का
Unknown
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सैर-ए-गुलशन
को
जब
वो
आए
हैं
तब
कहीं
फूल
मुस्कुराए
हैं
आग
बरसेगी
देखना
इक
दिन
ज़ुल्म-ओ-दहशत
के
अब्र
छाए
हैं
उनके
रुख़्सार-ओ-लब-क़द-ओ-क़ामत
फिर
से
महफ़िल
में
खींच
लाए
हैं
आप
की
बात
हमने
की
ही
नहीं
आप
क्यूँ
सुन
के
तिलमिलाए
हैं
सुन
रहा
हूँ
वो
आ
के
जाएँगे
अश्क
आँखों
में
डबडबाए
हैं
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Shadab Shabbiri
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ग़ुर्बत
का
ऐलान
करोगे
अपना
ही
नुक़सान
करोगे
ख़ुद
खोए
खोए
रहते
हो
मेरा
क्या
तुम
ध्यान
करोगे
बुरा
भला
तुम
मुझको
कह
कर
काम
मिरा
आसान
करोगे
फ़र्ज़
अदा
ही
करोगे
अपना
मुझ
पर
क्या
एहसान
करोगे
कन्याओं
के
दुश्मन
हो
तुम
तुम
क्या
कन्यादान
करोगे
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Shadab Shabbiri
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एहसाँ
भी
नहीं
मानते
क्या
जानते
नहीं
मेरे
बदन
की
ख़ाक
तुम्हारे
बदन
में
है
Shadab Shabbiri
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मन्ज़र
कोई
नहीं
है
नहीं
रंग-ओ-बू
मगर
शादाब
मेरा
नाम
है
अफ़सोस
कीजिए
Shadab Shabbiri
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चार
सू
ग़म
की
आग
फैली
थी
मोम
जैसा
पिघल
गया
हूँ
मैं
Shadab Shabbiri
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