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Sanjay Bhat
nahin lafz ka is qadar zor hai zindagi par
nahin lafz ka is qadar zor hai zindagi par | नहीं लफ़्ज़ का इस क़दर ज़ोर है ज़िंदगी पर
- Sanjay Bhat
नहीं
लफ़्ज़
का
इस
क़दर
ज़ोर
है
ज़िंदगी
पर
कि
मुमकिन
नहीं
एक
भी
हाँ
मिरी
ज़िंदगी
में
- Sanjay Bhat
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जिस्म
बूढ़ा
हुआ
तो
नज़र
झुक
गई
साँस
भारी
हुई
चाल
भी
रुक
गई
तू
तो
रखता
था
ख़ुद
को
बहुत
प्यार
से
उम्र
ढलने
से
रौनक़
कहाँ
फुक
गई
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Sanjay Bhat
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कहाँ
यकसाँ
नज़र
है
कहाँ
यकसानियत
है
है
हासिल
सब
किसी
को
किसी
को
रिज़्क़
भी
कम
Sanjay Bhat
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बड़े
नाज़ों
से
इन
आँखों
ने
ख़ुद
ये
ख़्वाब
पाले
थे
ज़रा
सा
चुभ
रहे
हैं
ख़्वाब
तो
अब
नम
हैं
आँखें
क्यूँ
Sanjay Bhat
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ऐसे
इंसाँ
से
नाता
नहीं
दिल
की
धड़कन
जो
सुनता
नहीं
तुम
जो
मरहम
करोगे
तो
क्या
ज़ख़्म
हूँ
वो
जो
भरता
नहीं
घर
के
कोने
में
रहने
तो
दे
मैं
तो
बूढ़ा
हूँ
हिलता
नहीं
वो
अँधेरे
से
डरता
है
क्या
चाँद
तन्हा
वो
दिखता
नहीं
अब
तसल्ली
न
आईना
दे
क्यूँ
मैं
अब
ख़ुद
पे
मरता
नहीं
तुम
जो
मुझ
से
मिलो
तो
मिलूँ
मैं
यूँँ
ख़ुद
से
भी
मिलता
नहीं
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Sanjay Bhat
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ग़म
है
क्या
कुछ
पता
ही
नहीं
दर्द
है
पर
सज़ा
ही
नहीं
ज़ीस्त
बे-रंग
अदा
ही
नहीं
रंग
था
जो
खिला
ही
नहीं
हम
ही
मुजरिम
हैं
मालूम
है
और
किसी
की
ख़ता
ही
नहीं
दिल
की
बाज़ी
वो
हारा
है
यूँँ
जैसे
दिल
से
लड़ा
ही
नहीं
ज़िंदगी
संगदिल
है
बहुत
कौन
है
जो
पिसा
ही
नहीं
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Sanjay Bhat
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