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Chandrapal singh nishad
vo kal ki raat
vo kal ki raat | वो कल की रात
- Chandrapal singh nishad
वो
कल
की
रात
कितना
परेशां
था
मैं
कल
की
रात
ख़ुद
से
कर
रहा
था
सवाल
मैं
कल
की
रात
अरे
किसी
ने
उसकी
दी
हुई
घड़ी
तोड़
दी
ख़ुद
से
लड़
पड़ा
हूँ
मैं
कल
की
रात
मेरे
मकाँ
में
सिर्फ़
मैं
ही
तो
हूँ
अरसों
से
आख़िर
मैं
करता
भी
क्या
कल
की
रात
- Chandrapal singh nishad
रात
भर
उन
का
तसव्वुर
दिल
को
तड़पाता
रहा
एक
नक़्शा
सामने
आता
रहा
जाता
रहा
Akhtar Shirani
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बदल
जाएँगे
ये
दिन
रात
'अजमल'
कोई
ना-मेहरबाँ
कब
तक
रहेगा
Ajmal Siraj
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उस
के
ख़त
रात
भर
यूँँ
पढ़ता
हूँ
जैसे
कल
इम्तिहान
हो
मेरा
Zubair Ali Tabish
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है
किसी
जालिम
उदू
की
घात
दरवाज़े
में
है
या
मसाफ़त
है
नई
या
रात
दरवाज़े
में
है
जिस
तरहा
उठती
है
नजरें
बे-इरादा
बार-बार
साफ़
लगता
है
के
कोई
बात
दरवाजे
में
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Farhat Abbas Shah
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ख़मोश
झील
के
पानी
में
वो
उदासी
थी
कि
दिल
भी
डूब
गया
रात
माहताब
के
साथ
Rehman Faris
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तन्हाई
के
हुजूम
में
वो
एक
तेरी
याद
जैसे
अँधेरी
रात
में
जलता
हुआ
दिया
Sagheer Lucky
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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मैं
जिस
के
साथ
कई
दिन
गुज़ार
आया
हूँ
वो
मेरे
साथ
बसर
रात
क्यूँँ
नहीं
करता
Tehzeeb Hafi
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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