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Sachin Sharma
mujhko ooncha na kah kar uthao abhii
mujhko ooncha na kah kar uthao abhii | मुझको ऊँचा न कह कर उठाओ अभी
- Sachin Sharma
मुझको
ऊँचा
न
कह
कर
उठाओ
अभी
मुझको
छोटा
न
कह
कर
गिराओ
अभी
मैंने
सीखा
नहीं
है
अभी
ये
हुनर
मुझको
शायर
न
कह
कर
बुलाओ
अभी
- Sachin Sharma
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चल
गया
होगा
पता
ये
आपको
बे-वफ़ा
कहते
हैं
लड़के
आपको
इक
ज़रा
से
हुस्न
पर
इतनी
अकड़
तू
समझती
क्या
है
अपने
आपको
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Kushal Dauneria
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बे-ख़ुदी
में
ले
लिया
बोसा
ख़ता
कीजे
मुआ'फ़
ये
दिल-ए-बेताब
की
सारी
ख़ता
थी
मैं
न
था
Bahadur Shah Zafar
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अगर
तुम्हारी
अना
ही
का
है
सवाल
तो
फिर
चलो
मैं
हाथ
बढ़ाता
हूँ
दोस्ती
के
लिए
Ahmad Faraz
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ये
हुनर
जो
आ
जाए,
आपका
ज़माना
है
पाँव
किसके
छूने
हैं,
सर
कहाँ
झुकाना
है
Astitwa Ankur
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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उम्र
जो
बे-ख़ुदी
में
गुज़री
है
बस
वही
आगही
में
गुज़री
है
Gulzar Dehlvi
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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अगर
पलक
पे
है
मोती
तो
ये
नहीं
काफ़ी
हुनर
भी
चाहिए
अल्फ़ाज़
में
पिरोने
का
Javed Akhtar
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हज़ारों
शे'र
कहने
को
तो
कह
सकते
सचिन
लेकिन
ग़ज़ल
के
शे'रों
में
मक़्ता
कभी
आसाँ
नहीं
होता
Sachin Sharma
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अलविदा
बोला
बड़े
ही
प्यार
से
मैं
लिपटकर
रोया
फिर
दीवार
से
आज
मैं
इज़हार
कर
दूँ
तो
उधर
कहने
लग
जाएगा
वो
दो
चार
से
प्रेम
ही
आधार
है
जीवन
का
तो
क्या
ही
हासिल
होगा
इस
तकरार
से
अपने
पैरों
पे
खड़ा
हो
जाऊँ
तो
तेरे
बारे
में
कहूँ
विस्तार
से
इतना
क्यूँ
इतराना
अपने
आप
पर
इक
न
इक
दिन
जाना
है
संसार
से
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Sachin Sharma
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खू़ँ
भरा
ख़त
है
ग़लत
है
शा'इरी
लत
है
ग़लत
है
छोड़
लड़की
हाथ
मेरा
ओछी
हरकत
है
ग़लत
है
भाग
के
शादी
करे
जो
ये
मुहब्बत
है
ग़लत
है
दिल
से
दिल
मिलना
है
बेहतर
तन
की
चाहत
है
ग़लत
है
अंधो
में
काना
है
राजा
बादशाहत
है
ग़लत
है
न्याय
के
मंदिर
रखी
है
अंधी
मूरत
है
ग़लत
है
जौन
ने
थूका
लहू
था
तब
ये
शोहरत
है
ग़लत
है
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Sachin Sharma
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रोज़
बदलता
है
स्टोरी
अपनी
वो
हर
तस्वीर
हिफ़ाज़त
से
रक्खी
है
Sachin Sharma
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युद्ध
का
परिणाम
होना
चाहिए
प्यार
सब
में
आम
होना
चाहिए
हो
अगर
सच्ची
मुहब्बत
तो
सुनो
इश्क़
में
नाकाम
होना
चाहिए
ठीक
होने
की
दवा
मत
दीजिए
ज़हरस
आराम
होना
चाहिए
उगते
और
ढलते
दिवाकर
को
नमन
सुब्ह
और
हर
शाम
होना
चाहिए
बातों-बातों
में
ग़ज़ल
ने
कह
दिया
जौन
सा
बदनाम
होना
चाहिए
इस
सदी
में
हो
गए
रावन
कई
इस
सदी
में
राम
होना
चाहिए
हरकतें
करते
हो
ऐसी
तुम
'सचिन'
पागलों
में
नाम
होना
चाहिए
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Sachin Sharma
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