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Ritika reet
dekh kar ham khwaab uske ro diye
dekh kar ham khwaab uske ro diye | देख कर हम ख़्वाब उसके रो दिए
- Ritika reet
देख
कर
हम
ख़्वाब
उसके
रो
दिए
नींद
जिसकी
हैं
चुराकर
लाए
हम
- Ritika reet
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कहाँ
है
तू
कि
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐ
दोस्त
तमाम
रात
सुलगते
हैं
दिल
के
वीराने
Nasir Kazmi
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उसे
यूँँ
चेहरा-चेहरा
ढूँढता
हूँ
वो
जैसे
रात-दिन
सड़कों
पे
होगा
Shariq Kaifi
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तेरे
बिन
घड़ियाँ
गिनी
हैं
रात
दिन
नौ
बरस
ग्यारह
महीने
सात
दिन
Rehman Faris
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भूला
नहीं
हूँ
आज
भी
हालात
गाँव
के
हाँ,
शहर
आ
गया
हूँ
मगर
साथ
गाँव
के
दुनिया
में
मेरा
नाम
जो
रोशन
हुआ
अगर
जलने
लगेंगे
बल्ब
भी
हर
रात
गाँव
के
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Tanoj Dadhich
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तेरी
आँखों
के
लिए
इतनी
सज़ा
काफ़ी
है
आज
की
रात
मुझे
ख़्वाब
में
रोता
हुआ
देख
Abhishek shukla
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किताबें,
रिसाले
न
अख़बार
पढ़ना
मगर
दिल
को
हर
रात
इक
बार
पढ़ना
Bashir Badr
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ठंडी
चाय
की
प्याली
पी
के
रात
की
प्यास
बुझाई
है
Rais Farog
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दफ़्तर
में
तय
किया
था
कि
तारे
गिनेंगे
आज
लेकिन
हमें
पहुंचते
ही
घर
नींद
आ
गई
Balmohan Pandey
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जिस
पर
हमारी
आँख
ने
मोती
बिछाए
रात
भर
भेजा
वही
काग़ज़
उसे
हम
ने
लिखा
कुछ
भी
नहीं
Bashir Badr
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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दीप
कोई
वहाँ
पर
जला
ही
नहीं
उसके
दिल
में
कभी
कोई
था
ही
नहीं
मैने
माँगा
था
रब
से
उसे
इसलिए
वो
मुसलसल
किसी
का
हुआ
ही
नहीं
दो
दिवारों
में
पहले
लड़ाई
हुई
फिर
दरारों
से
दामन
छुटा
ही
नहीं
साथ
मेरे
अजब
हादसा
हो
गया
वो
हुआ
सबका
मेरा
हुआ
ही
नहीं
एक
तस्वीर
से
मैंने
तस्वीर
ली
शख़्स
दो
है
मगर
एक
था
ही
नहीं
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Ritika reet
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तोड़
देता
वो
तन्हाई
में
दम
मगर
चाँद
आया
फ़क़त
तीरगी
के
लिए
Ritika reet
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रहनुमा
है
जो
रूठ
कर
आए
ढूँढते
उनको
दर-ब-दर
आए
आज
सजदे
में
ये
दु'आ
माँगी
याद
भी
उनकी
उम्र-भर
आए
मौत
के
अब
गले
लगेंगे
हम
लौटकर
फिर
न
वो
अगर
आए
लगता
शायद
है
आख़िरी
दिन
ये
घर
को
मेरे
है
चारा-गर
आए
है
गुज़ारिश
ख़ुदास
ये
मेरी
रूठ
कर
ही
मगर
वो
घर
आए
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जानते
हैं
उदास
रहते
हैं
आइने
ख़ुद
शनास
रहते
हैं
हम
हैं
सहरा
परस्त
लोगों
में
और
दरिया
के
पास
रहते
हैं
तेरा
चेहरा
है
और
मेरी
आँखें
क़ैद
पंछी
उदास
रहते
हैं
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थोड़ा
कम
थोड़ा
सा
ज़ियादा
है
इश्क़
है
या
कोई
ख़सारा
है
डांट
कर
है
जिसे
भगाया
गया
देखो
बच्चा
वो
भूखा
प्यासा
है
इश्क़
की
बात
कर
रहा
है
जो
कोई
पागल
नहीं
दिवाना
है
तंग
क्यूँ
करते
हो
उसे
लेकिन
जैसा
भी
है
वो
अब
तुम्हारा
है
जीत
मुमकिन
यहाँ
नहीं
होती
इश्क़
में
जो
गया
है
हारा
है
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