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Ravi 'VEER'
pahle dil ko aah mili
pahle dil ko aah mili | पहले दिल को आह मिली
- Ravi 'VEER'
पहले
दिल
को
आह
मिली
फिर
ग़ज़लों
को
वाह
मिली
जिसकी
ख़ातिर
मैं
तरसा
गैरों
को
वो
बाह
मिली
मैंने
था
चाहा
जिसको
उसको
सबकी
चाह
मिली
हाल
मेरा
जिसने
पूछा
उनको
इक
अफ़वाह
मिली
अरसों
तक
ख़ुद
को
बेचा
तब
जाकर
तनख़्वाह
मिली
बरसों
तक
भटका
पहले
फिर
जाकर
इक
राह
मिली
'वीर'
तुझे
है
हैरत
क्यूँँ
?
किसको
आख़िर
चाह
मिली
?
- Ravi 'VEER'
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हमें
मालूम
कुछ
हाँसिल
नहीं
होगा
मगर
फिर
भी
तेरी
गलियों
में
घू
में
हम
शहर
में
थी
कईं
गलियाँ
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मिरी
जान
अब
यूँँ
रुलाओ
न
मुझको
निगाहें
मिलाकर
पिलाओ
न
मुझको
बहुत
देर
के
बाद
अब
होश
आया
दुबारा
गले
तुम
लगाओ
न
मुझको
मुझे
अब
नहीं
है
भरोसा
किसी
पर
भरोसा
दुबारा
दिलाओ
न
मुझको
अगर
है
तुम्हारे
लिए
दिल
खिलौना
तो
खेलो
अकेले,
बुलाओ
न
मुझको
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Ravi 'VEER'
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करे
मिलने
मिलाने
की
ही
अब
जद्दोजहद
भी
क्यूँ
निभाए
जो
न
जाए
तो
करें
ऐसे
अहद
भी
क्यूँ
मिले
ख़ैरात
में
गर
इश्क़
तो
मंजूर
नफ़रत
है
दिलों
में
है
ज़हर
तो
फिर
ज़ुबाँ
पर
है
शहद
भी
क्यूँ
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वो
बे-वफ़ा
रहे
पर
मुझको
वफ़ा
रहेगी
आख़िर
वो
कब
तलक
ही
मुझ
सेे
जुदा
रहेगी
मुझको
यक़ीन
इक
दिन
वो
आ
मिलेगी
मुझ
सेे
तितली
भी
फूल
से
यूँँ
कब
तक
ख़फ़ा
रहेगी
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Ravi 'VEER'
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वक़्त
कितना
भी
बिता
कर
देख
लो
दोस्तों
से
मन
नहीं
भर
पाएगा
Ravi 'VEER'
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