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Raunak Karn
raat ko kaise sota hogaa
raat ko kaise sota hogaa | रात को कैसे सोता होगा
- Raunak Karn
रात
को
कैसे
सोता
होगा
जो
दिल
खोल
न
रोता
होगा
- Raunak Karn
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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तेरे
बिन
घड़ियाँ
गिनी
हैं
रात
दिन
नौ
बरस
ग्यारह
महीने
सात
दिन
Rehman Faris
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दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
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दूर
रह
कर
न
करो
बात
क़रीब
आ
जाओ
याद
रह
जाएगी
ये
रात
क़रीब
आ
जाओ
Sahir Ludhianvi
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इक
रात
उस
ने
चंद
सितारे
बुझा
दिए
उस
को
लगा
था
कोई
उन्हें
गिन
नहीं
रहा
Khurram Afaq
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इसी
खंडर
में
कहीं
कुछ
दिए
हैं
टूटे
हुए
इन्हीं
से
काम
चलाओ
बड़ी
उदास
है
रात
Firaq Gorakhpuri
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चूँकि
रोना
बहाल
रहता
है
ख़ुश्क
आँखों
का
हाल
रहता
है
नींद
आँखों
से
क्यूँँ
गुरेज़ा
है
रात
भर
ये
सवाल
रहता
है
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Sumit Panchal
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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हमारी
याद
आने
पर
अकेली
रात
में
तुम
भी
कभी
पंखा
कभी
टीवी
कभी
दीवार
देखोगे
Ambar
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अजीब
सानेहा
मुझ
पर
गुज़र
गया
यारो
मैं
अपने
साए
से
कल
रात
डर
गया
यारो
Shahryar
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ज़माना
देख
लेगा
कौन
हैं
हम
वक़्त
आने
पर
अभी
ख़ुद
को
जलाऍंगे
अभी
ख़ुद
को
तपाऍंगे
अभी
तो
जा
रहे
हैं
डूब
करके
मात
खाने
को
मगर
इक
रोज़
रौनक़
बनके
हम
भी
लौट
आऍंगे
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Raunak Karn
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हमें
देते
थे
टॉफ़ी
तुम
सनम
अब
भूल
बैठे
हो
कभी
तो
पूछ
लो
हम
सेे
कि
तुम
दिलदार
कैसे
हो
चले
जाओ
रहो
तुम
ख़ुश
करो
तुम
नाम
भी
अपना
कभी
भी
हम
न
बोलेंगे
कि
तुम
ऐ
यार
मेरे
हो
तुम्हें
हम
छोड़
देते
और
अपना
भी
नहीं
कहते
मगर
इस
बात
से
लगता
है
दिलबर
तुम
भी
सह
में
हो
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Raunak Karn
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कभी
दिल
भी
कभी
घर
भी
कभी
ख़ंजर
बदलता
है
वही
तो
यार
मेरा
था
वही
मंज़र
बदलता
है
हमें
सिखला
रहा
है
वो
अरे
अब
प्यार
की
बातें
वही
जो
दो
दिनों
में
ही
सभी
दिलबर
बदलता
है
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Raunak Karn
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अब
तलक
बेरंग
अपना
गाल
रक्खा
है
हाथ
में
क्या
रंग
तूने
लाल
रक्खा
है
Raunak Karn
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बहन
ने
बाँध
कर
राखी
जताया
प्यार
राखी
का
बरस
के
बाद
आया
फिर
ये
अब
त्योहार
राखी
का
चमन
से
फूल
लाओ
या
ले
आओ
शाख़
ही
कोई
बहन
के
बाँधने
से
बनता
है
ये
हार
राखी
का
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Raunak Karn
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