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Raunak Karn
likhoon dilbar tumhein apna ya phir mehmaan main likh doon
likhoon dilbar tumhein apna ya phir mehmaan main likh doon | लिखूँ दिलबर तुम्हें अपना, या फिर मेहमान मैं लिख दूँ
- Raunak Karn
लिखूँ
दिलबर
तुम्हें
अपना,
या
फिर
मेहमान
मैं
लिख
दूँ
लिखूँ
आँसु
तुम्हें
अपना
या
फिर
मुस्कान
मैं
लिख
दूँ
- Raunak Karn
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आप
की
याद
आती
रही
रात
भर
चश्म-ए-नम
मुस्कुराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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रूमाल
ले
लिया
है
किसी
माह-जबीन
से
कब
तक
पसीना
पोंछते
हम
आस्तीन
से
ये
आँसुओं
के
दाग़
हैं,
आँसू
ही
धोएँगे
ये
दाग़
धुल
न
पाएँगे
वाशिंग
मशीन
से
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Waseem Nadir
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आँख
आँसू
को
ऐसे
रस्ता
देती
है
जैसे
रेत
गुज़रने
दरिया
देती
है
कोई
भी
उसको
जीत
नहीं
पाया
अब
तक
वैसे
वो
हर
एक
को
मौक़ा
देती
है
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Kafeel Rana
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इतना
तो
ज़िन्दगी
में
किसी
के
ख़लल
पड़े
हँसने
से
हो
सुकून
न
रोने
से
कल
पड़े
जिस
तरह
हँस
रहा
हूँ
मैं
पी
पी
के
गर्म
अश्क
यूँँ
दूसरा
हँसे
तो
कलेजा
निकल
पड़े
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Kaifi Azmi
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अश्कों
को
आरज़ू-ए-रिहाई
है
रोइए
आँखों
की
अब
इसी
में
भलाई
है
रोइए
Abbas Qamar
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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तेरी
यादों
में
निकले
अश्क़
भी
ज़ाया'
नहीं
जाते
मैं
आँसू
पोछ
करके
आस्तीं
को
चूम
लेता
हूँ
Shabab Shahzad Khan
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कुछ
ख़ुशियाँ
कुछ
आँसू
दे
कर
टाल
गया
जीवन
का
इक
और
सुनहरा
साल
गया
Unknown
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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ज़ख़्म
तो
क़ीमती
नेमत
है
तू
ये
माना
कर
ज़ख़्म
सीने
से
लगाएगा
तो
छा
जाएगा
जब
नहीं
करता
है
कुछ
तो
है
तू
इतना
आला
ख़ुद
को
पागल
जो
बनाएगा
तो
छा
जाएगा
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Raunak Karn
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ग़ुलामी
की
अगर
जो
बात
आ
जाए
क़सम
है
यार
मर
या
मार
जाएँगे
Raunak Karn
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ज़िंदगी
में
ज़िंदगी
का
साथ
दोगी
ये
कहो
तुम
मेरे
ही
साथ
जीवन
भर
रहोगी
ये
कहो
बात
ये
लागू
न
तुम
पे
बात
ये
बस
मेरी
है
तुम
हमेशा
ख़ुश
रहोगी
ये
कहोगी
ये
कहो
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Raunak Karn
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नहीं
है
वक़्त
की
ये
बात
जो
हम
आज
कहते
हैं
फ़रिश्ते
यार
मामा
के
तरह
तो
साथ
रहते
हैं
Raunak Karn
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हमें
वो
नींद
में
भी
अब
बुलाती
है
सही
में
याद
भी
उसकी
सताती
है
गया
है
लग
पता
उसकी
सहेली
से
मुझे
अपना
सभी
को
वो
बताती
है
लिखे
थे
जो
ग़ज़ल
उसके
लिए
मैंने
सही
में
वो
ग़ज़ल
सबको
सुनाती
है
रुलाया
है
नहीं
हमको
किसी
ग़म
ने
हमें
जितना
सही
में
वो
रुलाती
है
नहीं
थी
तब
उसे
तकलीफ़
कोई
भी
ख़ुशी
तेरी
यही
बातें
बताती
है
कहाँ
जाए
किसे
बोले
तिरी
बातें
शबिस्ताँ
में
तुझे
क्या
याद
आती
है
उतरता
है
यहाँ
बादल
मगर
फिर
भी
बिना
बादल
नयन
ये
भीग
जाती
है
गया
था
पास
में
उसके
सही
में
कल
सही
में
वो
मुझे
अब
भूल
जाती
है
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Raunak Karn
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