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Ranjan Kumar Barnwal
pooch baitha main khu
pooch baitha main khu | पूछ बैठा मैं ख़ुदी से
- Ranjan Kumar Barnwal
पूछ
बैठा
मैं
ख़ुदी
से
क्या
मिला
है
ख़ुद-कुशी
से
दिल
अकेला
क्या
ही
करता
हार
बैठा
अजनबी
से
यार
तुम
पैसे
कमाओ
क्या
मिलेगा
आशिक़ी
से
तितलियों
के
इक
सबब
से
फूल
बन
बैठा
कली
से
दुश्मनी
कोई
भी
कर
ले
मैं
मरूँगा
बस
इसी
से
मौत
आनी
है
सभी
को
आज
तो
जी
ले
ख़ुशी
से
फूल
कलियाँ
तोड़
लाया
बाँटता
हूँ
क्यूँ
ख़ुशी
से
रीत
दुनिया
की
यही
है
फ़र्क
क्या
पड़ता
सही
से
ख़ुद
से
जो
मैं
कह
रहा
हूँ
आज
कह
दूँगा
सभी
से
- Ranjan Kumar Barnwal
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निभाया
जिस
सेे
भी
रिश्ता
तो
फिर
हद
में
रहे
हैं
हम
किसी
के
मखमली
तकिए
के
ऊपर
सर
नहीं
रक्खा
Nirbhay Nishchhal
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हमेशा
साथ
सबके
तो
ख़ुदा
भी
रह
नहीं
सकता
बनाकर
औरतें
उसने
ज़मीं
को
यूँँ
किया
जन्नत
Anukriti 'Tabassum'
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अच्छी
बुरी
हर
इक
कमी
के
साथ
हैं
हम
यार
आँखों
की
नमी
के
साथ
हैं
दो
जिस्म
ब्याहे
जा
रहे
हैं
आज
भी
हम
सब
पराए
आदमी
के
साथ
हैं
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Neeraj Neer
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हमेशा
यही
भूल
करता
रहा
तेरा
साथ
पाने
को
मरता
रहा
सुनहरे
बहारों
के
मौसम
तले
गुलिस्ताँ
हमारा
बिखरता
रहा
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Ambar
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जब
तक
जला
ये
हम
भी
जले
इसके
साथ
साथ
जब
बुझ
गया
चराग़
तो
सोना
पड़े
हमें
Abbas Qamar
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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फिरता
है
कैसे-कैसे
सवालों
के
साथ
वो
उस
आदमी
की
जामातलाशी
तो
लीजिए
Dushyant Kumar
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मौत
के
साथ
हुई
है
मिरी
शादी
सो
'ज़फ़र'
उम्र
के
आख़िरी
लम्हात
में
दूल्हा
हुआ
मैं
Zafar Iqbal
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बारिशें
जाड़े
की
और
तन्हा
बहुत
मेरा
किसान
जिस्म
और
इकलौता
कंबल
भीगता
है
साथ-साथ
Parveen Shakir
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दिल
बना
दोस्त
तो
क्या
क्या
न
सितम
उस
ने
किए
हम
भी
नादां
थे
निभाते
रहे
नादान
के
साथ
Shakeel Badayuni
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इश्क़
में
गर
यार
रिश्ता
टूटता
है
यानी
अपनी
माँ
से
बच्चा
रूठता
है
Ranjan Kumar Barnwal
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उसे
देख
पतझड़
में
मैंने
ये
सोचा
कि
शाख़ों
में
कोई
कली
आ
रही
है
Ranjan Kumar Barnwal
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तुम्हारे
हुस्न
का
वर्णन
है
मुश्किल
तुम्हें
ऐसे
तराशा
जा
चुका
है
Ranjan Kumar Barnwal
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अजब
इतिहास
लिखकर
बैठा
हूँ
मैं
नदी
की
प्यास
लिखकर
बैठा
हूँ
मैं
गिरेगी
ओस
की
बूँदें
यक़ीं
कर
मरुस्थल
घास
लिखकर
बैठा
हूँ
मैं
बदन
से
रूह
तक
चर्चा
रहेगा
वो
इक
एहसास
लिखकर
बैठा
हूँ
मैं
जिसे
मैं
जीतकर
भी
हार
बैठा
उसी
को
ख़ास
लिखकर
बैठा
हूँ
मैं
भटकता
फिर
रहा
खाने
कमाने
ये
क्या
वनवास
लिखकर
बैठा
हूँ
मैं
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Ranjan Kumar Barnwal
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दुनिया
में
ये
हर
दिन
हर
पल
होता
है
चाहत
में
ही
'आशिक़
सब
कुछ
खोता
है
Ranjan Kumar Barnwal
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