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Qambar Naqvi
bahaar lab pa hañsi ki na jaane kab guzri
bahaar lab pa hañsi ki na jaane kab guzri | बहार लब पा हँसी की न जाने कब गुज़री
- Qambar Naqvi
बहार
लब
पा
हँसी
की
न
जाने
कब
गुज़री
बगैर
अश्क
बहाए
न
कोई
शब
गुज़री
- Qambar Naqvi
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शिकस्ता
दिल
शब-ए-ग़म
दर्द
रुसवाई
अरे
इतना
तो
चलता
है
मुहब्बत
में
Sapna Moolchandani
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सर्द
रात
है
हवा
भी
सोच
मत
पहन
मुझे
सुब्ह
देख
लेंगे
किस
कलर
की
शाल
लेनी
है
Neeraj Neer
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जो
मेरे
साथ
मोहब्बत
में
हुई
आदमी
एक
दफा
सोचेगा
रात
इस
डर
में
गुजारी
हमने
कोई
देखेगा
तो
क्या
सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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बिगड़
गई
थी
जो
दुनिया
सॅंवार
दी
हमने
चढ़ा
के
सर
पे
मुहब्बत
उतार
दी
हमने
अँधेरी
रात
किसी
बे-वफ़ा
की
यादों
में
बहुत
तवील
थी
लेकिन
गुज़ार
दी
हमने
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Hameed Sarwar Bahraichi
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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ये
सर्द
रात
ये
आवारगी
ये
नींद
का
बोझ
हम
अपने
शहर
में
होते
तो
घर
चले
जाते
Ummeed Fazli
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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भूला
नहीं
हूँ
आज
भी
हालात
गाँव
के
हाँ,
शहर
आ
गया
हूँ
मगर
साथ
गाँव
के
दुनिया
में
मेरा
नाम
जो
रोशन
हुआ
अगर
जलने
लगेंगे
बल्ब
भी
हर
रात
गाँव
के
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Tanoj Dadhich
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रात
सोने
के
लिए
दिन
काम
करने
के
लिए
वक़्त
मिलता
ही
नहीं
आराम
करने
के
लिए
Jamal Ehsani
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उसे
यूँँ
चेहरा-चेहरा
ढूँढता
हूँ
वो
जैसे
रात-दिन
सड़कों
पे
होगा
Shariq Kaifi
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जब
हक़ीक़त
में
तुम्हें
इरफ़ाने-ग़म
हो
जाएगा
जिस
क़दर
टूटेगा
यह
दिल
मोहतरम
हो
जाएगा
Qambar Naqvi
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रफ़तार
इतनी
तेज़
थी
सैलाब-ए-दर्द
की
आँखों
के
बाँध
तोड़
के
आँसू
निकल
पड़े
फिर
भी
न
आफ़ताब
की
गैरत
को
आया
होश
तारीकियाँ
मिटाने
को
जुगनू
निकल
पड़े
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Qambar Naqvi
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निकालूँ
कैसे
मैं
दो
दिन
की
ज़िन्दगी
में
वक़्त
पचास
काम
मिरे
एक
दिन
में
रहते
हैं
Qambar Naqvi
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चलेगी
साँस,
जब
तक
दम
रहेगा
तिरे
जाने
का
दिल
में
ग़म
रहेगा
तबस्सुम
अब
न
ठहरेगा
लबों
पर
यह
चेहरा
आँसुओं
से
नम
रहेगा
न
टूटेगा
तसलसुल
दर्द-ओ-ग़म
का
बहुत,
थोड़ा,
ज़्यादा,
कम
रहेगा
मोहब्बत
में
गुलाबी
जो
बदन
था
वो
ज़हरे-हिज्र
से
नीलम
रहेगा
हमारा
वस्ल
तो
मुमकिन
नहीं
अब
यह
ख़्वाबो-अश्क
का
संगम
रहेगा
कोई
रुत
हो
बदल
जाएगी
इक
दिन
उदासी
का
मगर
मौसम
रहेगा
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Qambar Naqvi
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अब
रहम
कोई
खाएगा
क्या
मेरे
हाल
पर
जब
तुमने
मुझको
छोड़
दिया
मेरे
हाल
पर
मुसतक़बिल
अच्छा
गुज़रेगा
अपना
न
जाने
कब
माज़ी
भी
मुस्कुराने
लगा
मेरे
हाल
पर
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Qambar Naqvi
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