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Qambar Naqvi
bazahir kaun-sa rishta nahin hai
bazahir kaun-sa rishta nahin hai | बज़ाहिर कौन-सा रिश्ता नहीं है
- Qambar Naqvi
बज़ाहिर
कौन-सा
रिश्ता
नहीं
है
हक़ीक़त
में
कोई
अपना
नहीं
है
हमारी
ख़ैरियत
क्यूँ
पूछते
हो
तुम्हें
मालूम
आख़िर
क्या
नहीं
है
ज़रूरत
से
तो
सब
मिलते
हैं
अपनी
हमें
तुम
से
कोई
शिकवा
नहीं
है
ज़माना
क्या,
न
अपने
होंगे
अपने
तुम्हारे
पास
गर
पैसा
नहीं
है
हमें
'क़म्बर'
वही
अच्छा
लगे
है
जिसे
नज़दीक
से
देखा
नहीं
है
- Qambar Naqvi
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तुम्हें
भी
साँस
लेने
की
कमी
हो
तुम्हें
भी
ज़िंदगी
ठुकरा
के
जाए
Ambar
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अपना
रिश्ता
ज़मीं
से
ही
रक्खो
कुछ
नहीं
आसमान
में
रक्खा
Jaun Elia
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ये
फ़िल्मों
में
ही
सबको
प्यार
मिल
जाता
है
आख़िर
में
मगर
सचमुच
में
इस
दुनिया
में
ऐसा
कुछ
नहीं
होता
चलो
माना
कि
मेरा
दिल
मेरे
महबूब
का
घर
है
पर
उसके
पीछे
उसके
घर
में
क्या-क्या
कुछ
नहीं
होता
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Tehzeeb Hafi
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मेरे
दर्द
की
वो
दवा
है
मगर
मेरा
उस
सेे
कोई
भी
रिश्ता
नहीं
मुसलसल
मिलाता
है
मुझ
सेे
नज़र
मैं
कैसे
कहूँ
वो
फ़रिश्ता
नहीं
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S M Afzal Imam
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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इतनी
मिलती
है
मिरी
ग़ज़लों
से
सूरत
तेरी
लोग
तुझ
को
मिरा
महबूब
समझते
होंगे
Bashir Badr
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आप
अपने
से
हम-सुख़न
रहना
हमनशीं
साँस
फूल
जाती
है
Jaun Elia
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आईने
आँख
में
चुभते
थे
बिस्तर
से
बदन
कतराता
था
एक
याद
बसर
करती
थी
मुझे
मैं
साँस
नहीं
ले
पाता
था
Tehzeeb Hafi
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मिरी
तरफ़
से
तो
टूटा
नहीं
कोई
रिश्ता
किसी
ने
तोड़
दिया
ए'तिबार
टूट
गया
Akhtar Nazmi
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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अब
रहम
कोई
खाएगा
क्या
मेरे
हाल
पर
जब
तुमने
मुझको
छोड़
दिया
मेरे
हाल
पर
मुसतक़बिल
अच्छा
गुज़रेगा
अपना
न
जाने
कब
माज़ी
भी
मुस्कुराने
लगा
मेरे
हाल
पर
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Qambar Naqvi
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निकालूँ
कैसे
मैं
दो
दिन
की
ज़िन्दगी
में
वक़्त
पचास
काम
मिरे
एक
दिन
में
रहते
हैं
Qambar Naqvi
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बंद
लफ्ज़ों
में
एक
बात
कहूँ
आप
जैसा
कोई
शरीफ़
नहीं
Qambar Naqvi
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रफ़तार
इतनी
तेज़
थी
सैलाब-ए-दर्द
की
आँखों
के
बाँध
तोड़
के
आँसू
निकल
पड़े
फिर
भी
न
आफ़ताब
की
गैरत
को
आया
होश
तारीकियाँ
मिटाने
को
जुगनू
निकल
पड़े
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Qambar Naqvi
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ज़िन्दगी
ख़त्म
होने
वाली
है
ऐसा
लगता
है
कुछ
अधूरा
है
Qambar Naqvi
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