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Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
zaraa se husn par hi vo akad aise rahi hai
zaraa se husn par hi vo akad aise rahi hai | ज़रा से हुस्न पर ही वो अकड़ ऐसे रही है
- Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
ज़रा
से
हुस्न
पर
ही
वो
अकड़
ऐसे
रही
है
कि
जैसे
हम
किसी
और
को
कभी
देखे
नहीं
हैं
- Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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पा
ए
उम्मीद
प
रक्खे
हुए
सर
हैं
हम
लोग
हैं
न
होने
के
बराबर
ही
मगर
हैं
हम
लोग
तू
ने
बरता
ही
नहीं
ठीक
से
हम
को
ऐ
दोस्त
ऐब
लगते
हैं
ब-ज़ाहिर
प
हुनर
हैं
हम
लोग
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Abhishek shukla
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हुनर
से
काम
लिया
पेंट
ब्रश
नहीं
तोड़ा
बना
लिया
तेरे
जैसा
ही
कोई
रंगों
से
मुझे
ये
डर
है
कि
मिल
जाएगी
तो
रो
दूँगा
मैं
जिस
ख़ुशी
को
तरसता
रहा
हूँ
बरसों
से
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Rahul Gurjar
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उम्र
जो
बे-ख़ुदी
में
गुज़री
है
बस
वही
आगही
में
गुज़री
है
Gulzar Dehlvi
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ख़ुद
को
मनवाने
का
मुझको
भी
हुनर
आता
है
मैं
वो
कतरा
हूँ
समुंदर
मेरे
घर
आता
है
Waseem Barelvi
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ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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जो
कुछ
मता-ए-हुनर
हो
तो
सामने
लाओ
कि
ये
ज़माना-ए-इज़हार-ए-नस्ल-ओ-रंग
नहीं
Akbar Ali Khan Arshi Zadah
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बे-ख़ुदी
में
ले
लिया
बोसा
ख़ता
कीजे
मुआ'फ़
ये
दिल-ए-बेताब
की
सारी
ख़ता
थी
मैं
न
था
Bahadur Shah Zafar
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ये
हुनर
जो
आ
जाए,
आपका
ज़माना
है
पाँव
किसके
छूने
हैं,
सर
कहाँ
झुकाना
है
Astitwa Ankur
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दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
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हुकूमत
को
गिराना
था
यही
उसका
निशाना
था
उसे
परवाह
हो
कैसे
उसे
तो
घर
बनाना
था
न
थे
पैसे
मगर
फिर
भी
जो
भी
था
वो
खज़ाना
था
उसे
तो
छोड़
जाना
था
मोहब्बत
भी
बहाना
था
वो
जो
गुज़रा
बरस
दो
इक
वो
भी
कितना
सुहाना
था
न
था
कुछ
वक़्त
ही
था
बस
वो
भी
क्या
इक
ज़माना
था
मोहब्बत
था
मोहब्बत
है
उसे
तो
बस
निभाना
था
गया
जो
मर
वो
इक
लड़का
वो
लड़का
इक
दिवाना
था
कहो
जो
भी
मगर
यारों
वो
तो
बेहद
सियाना
था
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Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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हर
बात
वो
कह
दी
छुपाया
कुछ
नहीं
हर
बात
कहकर
भी
बताया
कुछ
नहीं
हर
वक़्त
वो
कहती
ख़िलाफ़-ए-क़ाइदा
हर
बार
कहकर
भी
सिखाया
कुछ
नहीं
कहती
रही
कैसे
गुज़ारें
ज़िंदगी
वो
सिर्फ़
कहती
थी
दिखाया
कुछ
नहीं
मैं
मानता
हूँ
मैं
बुरा
तो
हूँ
मगर
उसने
किसी
को
तो
बताया
कुछ
नहीं
मशकूर
तो
हूँ
छोड़
जाने
का
मगर
उसने
मुझे
भी
तो
जताया
कुछ
नहीं
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Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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वो
छोड़
कर
तन्हा
हमें
जो
चल
दिया
हम
भी
चले
ख़ुद
को
इकहरा
छोड़
कर
Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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छोड़
भी
दे
अब
दु'आओं
में
माँगना
सब्र
रख
जो
भी
ख़ुदा
देता
है
तुझे
Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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सभी
का
इश्क़
अच्छा
है
मिरा
तो
इश्क़
सच्चा
है
Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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