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Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
hukoomat ko girana tha
hukoomat ko girana tha | हुकूमत को गिराना था
- Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
हुकूमत
को
गिराना
था
यही
उसका
निशाना
था
उसे
परवाह
हो
कैसे
उसे
तो
घर
बनाना
था
न
थे
पैसे
मगर
फिर
भी
जो
भी
था
वो
खज़ाना
था
उसे
तो
छोड़
जाना
था
मोहब्बत
भी
बहाना
था
वो
जो
गुज़रा
बरस
दो
इक
वो
भी
कितना
सुहाना
था
न
था
कुछ
वक़्त
ही
था
बस
वो
भी
क्या
इक
ज़माना
था
मोहब्बत
था
मोहब्बत
है
उसे
तो
बस
निभाना
था
गया
जो
मर
वो
इक
लड़का
वो
लड़का
इक
दिवाना
था
कहो
जो
भी
मगर
यारों
वो
तो
बेहद
सियाना
था
- Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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जिसको
फ़ुज़ूल
लगती
थी
रब
की
इबादतें
पाने
को
इश्क़
टूटते
तारे
पे
आ
गया
Om awasthi
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मैं
तेरे
साथ
सितारों
से
गुज़र
सकता
हूँ
कितना
आसान
मोहब्बत
का
सफ़र
लगता
है
Bashir Badr
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इश्क़
हमारा
चाँद
सितारे
छू
लेगा
घुटनों
पर
आकर
इज़हार
किया
हमने
Darpan
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फ़ुर्सत
नहीं
मुझे
कि
करूँँ
इश्क़
फिर
से
अब
माज़ी
की
चोटों
से
अभी
उभरा
नहीं
हूँ
मैं
डर
है
कहीं
ये
ऐब
उसे
रुस्वा
कर
न
दे
सो
ग़म
में
भी
शराब
को
छूता
नहीं
हूँ
मैं
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Harsh saxena
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इश्क़
को
जब
हुस्न
से
नज़रें
मिलाना
आ
गया
ख़ुद-ब-ख़ुद
घबरा
के
क़दमों
में
ज़माना
आ
गया
Asad Bhopali
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ऐ
इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
हाँ
इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
आज
एक
सितमगर
को
हँस
हँस
के
रुलाना
है
Jigar Moradabadi
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तेरे
वादे
से
प्यार
है
लेकिन
अपनी
उम्मीद
से
नफ़रत
है
पहली
ग़लती
तो
इश्क़
करना
थी
शा'इरी
दूसरी
हिमाक़त
है
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Mehshar Afridi
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यार
इस
में
तो
मज़ा
है
ही
नहीं
कोई
भी
हम
सेे
ख़फ़ा
है
ही
नहीं
इश्क़
ही
इश्क़
है
महसूस
करो
और
कुछ
इसके
सिवा
है
ही
नहीं
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Madhyam Saxena
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तुम्हारे
साथ
था
तो
मैं
गम-ए-उल्फ़त
में
उलझा
था
तुम्हें
छोड़ा
तो
ये
जाना
कि
दुनिया
ख़ूब-सूरत
है
Nirbhay Nishchhal
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कितना
झूठा
था
अपना
सच्चा
इश्क़
हिज्र
से
दोनों
ज़िंदा
बच
निकले
Prit
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हर
बात
वो
कह
दी
छुपाया
कुछ
नहीं
हर
बात
कहकर
भी
बताया
कुछ
नहीं
हर
वक़्त
वो
कहती
ख़िलाफ़-ए-क़ाइदा
हर
बार
कहकर
भी
सिखाया
कुछ
नहीं
कहती
रही
कैसे
गुज़ारें
ज़िंदगी
वो
सिर्फ़
कहती
थी
दिखाया
कुछ
नहीं
मैं
मानता
हूँ
मैं
बुरा
तो
हूँ
मगर
उसने
किसी
को
तो
बताया
कुछ
नहीं
मशकूर
तो
हूँ
छोड़
जाने
का
मगर
उसने
मुझे
भी
तो
जताया
कुछ
नहीं
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Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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चाह
कर
के
भी
तुझे
मैं
यह
बता
सकता
नहीं
है
मुझे
तुझ
सेे
मोहब्बत
भी
जता
सकता
नहीं
मैं
लिए
फिरता
हूँ
नाकामी
मोहब्बत
में
मगर
आशिक़ी
में
तो
निकम्मा
मैं
बता
सकता
नहीं
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Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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जिसके
होंटों
पे
थी
मेहर-ओ-मोहब्बत
उसकी
हाथों
पे
अब
मेहँदी
लगी
है
Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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फ़ासलों
का
ही
था
वो
दीवार
कैसे
तोड़
सकते
ईश्क
ना
होता
तो
टूटे
दिल
को
कैसे
जोड़
सकते
Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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इश्क़
में
खुदको
बर्बाद
तो
कर
चुका
अब
मुझे
तेरी
कोई
ज़रूरत
नहीं
Mohammad Maashir Raza 'Qabeeh'
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