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Prit
paas the ham magar kuchh aise the
paas the ham magar kuchh aise the | पास थे हम मगर कुछ ऐसे थे
- Prit
पास
थे
हम
मगर
कुछ
ऐसे
थे
जनवरी
थी
वो
मैं
दिसंबर
था
- Prit
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'प्रीत'
जिस
तिस
बहाने
कर
भी
ले
एक
तितली
से
बात
फूलों
की
Prit
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ये
पागल
लोग
जिनके
रंग
में
भी
धर्म
होता
है
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गीता
तो
जाने
धर्म
मतलब
कर्म
होता
है
जिसे
सोहबत
मिले
कान्हा
की
मिथ्या
जाने
दुनिया
को
उसे
ख़तरा
नहीं
है
जिसको
शिव
का
मर्म
होता
है
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Prit
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आप
जिनके
लिए
तरसते
हैं
वो
किसी
और
ही
पे
मरते
हैं
ये
मोहब्बत
तबाह
करती
है
बावले
हैं
जो
इश्क़
करते
हैं
ज़ुल्म
है
इश्क़
का
नया
मतलब
तो
चलो
आज
ज़ुल्म
सहते
हैं
जी
नहीं,
कोई
प्यार
व्यार
नहीं
सिर्फ़
हम
बात
वात
करते
हैं
शा'इरी
जो
है
कोई
खेल
नहीं
आप
ये
कैसी
बात
करते
हैं
तुम
मरे
जा
रहे
हो
जिनपे
"प्रीत"
क्या
वो
भी
तुम
सेे
इश्क़
करते
हैं?
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Prit
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जब
उसे
शा'इरी
पसंद
नहीं
मुझको
लानत
है
मेरी
ग़ज़लों
पे
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हर
दफ़ा
झूठ
कहते
थे
हम
लोग
देखो
तो
कितने
सच्चे
थे
हम
लोग
इसलिए
वादे
तोड़
देते
थे
एक
वादे
के
पक्के
थे
हम
लोग
दर्द
ने
ख़ाक
कर
दिया
वरना
जीने
से
पहले
मरते
थे
हम
लोग
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Prit
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