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Prashant Sitapuri
pehla sitam shafa ki davaa ek shaKHs tha
pehla sitam shafa ki davaa ek shaKHs tha | पहला सितम शफ़ा की दवा एक शख़्स था
- Prashant Sitapuri
पहला
सितम
शफ़ा
की
दवा
एक
शख़्स
था
दूजा
सितम
है
ये
कि
दवा
कुछ
न
कर
सकी
- Prashant Sitapuri
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इस
गए
साल
बड़े
ज़ुल्म
हुए
हैं
मुझ
पर
ऐ
नए
साल
मसीहा
की
तरह
मिल
मुझ
से
Sarfraz Nawaz
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ये
तो
बढ़ती
ही
चली
जाती
है
मीआद-ए-सितम
ज़ुज़
हरीफ़ान-ए-सितम
किस
को
पुकारा
जाए
वक़्त
ने
एक
ही
नुक्ता
तो
किया
है
तालीम
हाकिम-ए-वक़त
को
मसनद
से
उतारा
जाए
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Jaun Elia
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है
ये
कैसा
सितम
मौला
ये
हैं
दुश्वारियाँ
कैसी
जहाँ
पर
रोना
था
हमको
वहीं
पर
मुस्कुराना
है
Aqib khan
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जो
अंजान
थे
वो
मेरे
यार
निकले
मगर
जो
भी
अपने
थे
बेकार
निकले
ज़मीं
खा
गई
उन
वफ़ाओं
को
आख़िर
सितम
ये
हुआ
हम
गुनहगार
निकले
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Hameed Sarwar Bahraichi
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उम्र
के
आख़िरी
मक़ाम
में
हम
मिल
भी
जाए
तो
क्या
ख़ुशी
होगी
क्या
सितम
तुम
को
देखने
के
लिए
हम
को
दुनिया
भी
देखनी
होगी
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Vikram Sharma
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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ज़ुल्म
फिर
ज़ुल्म
है
बढ़ता
है
तो
मिट
जाता
है
ख़ून
फिर
ख़ून
है
टपकेगा
तो
जम
जाएगा
Sahir Ludhianvi
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सर
पर
हवा-ए-ज़ुल्म
चले
सौ
जतन
के
साथ
अपनी
कुलाह
कज
है
उसी
बाँकपन
के
साथ
Majrooh Sultanpuri
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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ये
घर
सब
ईंट
पत्थर
से
कहाँ
तैयार
होते
हैं
दु'आ
से
अपनी
ताकत
से
इन्हें
माएँ
बनाती
हैं
Prashant Sitapuri
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यही
एक
ख़्वाहिश
बची
है
मेरे
में
कि
अब
कोई
ख़्वाहिश
नहीं
ज़िन्दगी
की
Prashant Sitapuri
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कमाई
बाप
की
सारी
चली
जाती
है
बेटों
में
मगर
बेटा
उन्हीं
को
बेसहारा
छोड़
जाता
है
Prashant Sitapuri
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अगर
मौका
मिला
तो
एक
दिन
अख़बार
देखेंगे
सियाही
में
है
कितनी
झूठ
की
मिक़दार,
देखेंगे
Prashant Sitapuri
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जिसकी
आँखों
में
न
थे
आँसू
कभी
एक
दिन
वो
शख़्स
दरिया
बन
गया
Prashant Sitapuri
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