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Avijit Aman
khushi se tan ka hissa kha rahi hai
khushi se tan ka hissa kha rahi hai | ख़ुशी से तन का हिस्सा खा रही है
- Avijit Aman
ख़ुशी
से
तन
का
हिस्सा
खा
रही
है
हमें
तो
कल
की
चिंता
खा
रही
है
अभी
भी
वक़्त
है
आकर
बचा
लो
अना
ये
अपना
रिश्ता
खा
रही
है
- Avijit Aman
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चाहते
हैं
गर
बिछड़ना
आप
हम
सेे
आप
भी
हम
सेे
मुहब्बत
कीजिए
फिर
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तन्हा
ख़ामोशी
में
रहने
की
बातें
ख़ुद
से
ही
सब
कहने
की
मेरी
परवाह
मत
करना
तुम
मुझको
आदत
है
दुख
सहने
की
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Avijit Aman
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डाँटती
है
बस
मुझी
को
सुन
ज़रा
इस
ख़ामुशी
को
बोलते
हैं
मुस्कुराओ
छीन
कर
मेरी
हँसी
को
देके
आँसू
पूछते
हैं
क्या
हुआ
मेरी
ख़ुशी
को
तुमको
आगे
बढ़ना
है
गर
मत
सुनो
तुम
फिर
सभी
को
चाहते
हो
सीखना
गर
आज़माना
ज़िंदगी
को
इश्क़
तुमको
हो
गया
गर
दोष
मत
दो
दोस्ती
को
खेलकर
हैं
तोड़
देते
दिल
न
देना
हर
किसी
को
जान
लेती
है
ये
सबकी
तुम
न
करना
आशिक़ी
को
आँखों
को
तकलीफ़
दे
जो
छोड़
ऐसी
रौशनी
को
ज़िंदगी
से
थक
चुका
हूँ
रास्ता
दो
ख़ुद-कुशी
को
बेटियों
को
घूरे
जो
गर
मारों
ऐसे
आदमी
को
अब
नहीं
आएँगे
मोहन
शस्त्र
दो
तुम
द्रौपदी
को
धार
लानी
होगी
इस
में
चाहिए
दुख
शा'इरी
को
नाम
करना
है
जहाँ
में
छोड़
दूँ
क्या
नौकरी
को
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Avijit Aman
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ख़ुश्क
आँखों
की
नमी
हूँ
शोर
करती
ख़ामुशी
हूँ
ग़लतियाँ
होती
हैं
मुझ
सेे
यार
मैं
भी
आदमी
हूँ
ध्यान
से
पढ़िए
मुझे
सब
थोड़ी
मुश्किल
शा'इरी
हूँ
मैं
सभी
के
काम
आता
रास्ते
की
रौशनी
हूँ
जो
भरोसा
तोड़ते
हैं
उनकी
ख़ातिर
दुश्मनी
हूँ
कष्ट
में
सब
याद
करते
जैसे
कोई
ख़ुद-कुशी
हूँ
क्या
पता
कब
बीत
जाऊँ
आज
कल
की
ज़िंदगी
हूँ
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Avijit Aman
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याद
कब
से
तुम्हारी
मुझे
आ
रही
आके
मुझको
गले
से
लगा
लो
न
तुम
Avijit Aman
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