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Amanpreet singh
khushi ki boo si aati hai ye mere men
khushi ki boo si aati hai ye mere men | ख़ुशी की बू सी आती है ये मेरे में
- Amanpreet singh
ख़ुशी
की
बू
सी
आती
है
ये
मेरे
में
उदासी
काम
आती
है
अकेले
में
- Amanpreet singh
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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लब
पे
आता
था
जो
दु'आ
बन
कर
दिल
में
रहता
है
अब
ख़ला
बन
कर
कितना
इतरा
रहा
है
अब
वो
फूल
तेरे
बालों
का
मोगरा
बन
कर
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Haider Khan
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पता
करो
कि
मेरे
साथ
कौन
उतरा
था
ज़मीं
पे
कोई
अकेला
नहीं
उतरता
है
Ahmad Abdullah
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पहले
तो
वो
हाथ
पकड़कर
कमरे
से
बाहर
लाया
और
फिर
मुझको
इस
दुनिया
में
यार
अकेला
छोड़
गया
Tanoj Dadhich
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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तुम
अपने
बारे
में
कुछ
देर
सोचना
छोड़ो
तो
मैं
बताऊँ
कि
तुम
किस
क़दर
अकेले
हो
Waseem Barelvi
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बड़ी
मुश्किल
से
नीचे
बैठते
हैं
जो
तेरे
साथ
उठते-बैठते
हैं
अकेले
बैठना
होगा
किसी
को
अगर
हम
तुम
इकट्ठे
बैठते
हैं
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Khurram Afaq
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दरिया
की
वुसअतों
से
उसे
नापते
नहीं
तन्हाई
कितनी
गहरी
है
इक
जाम
भर
के
देख
Adil Mansuri
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अधूरे
शे'र
के
मिसरों
को
देखा
तो
किसे
कहते
हैं
तन्हाई
समझ
आई
Sunny Seher
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एक
महफ़िल
में
कई
महफ़िलें
होती
हैं
शरीक
जिस
को
भी
पास
से
देखोगे
अकेला
होगा
Nida Fazli
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पुरानी
सी
किसी
अख़बार
सा
तो
हो
गया
हूँ
मैं
जिसे
पढ़ने
में
दिल
कोई
लगाता
ही
नहीं
है
अब
Amanpreet singh
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असर
फिर
इश्क़
का
होने
लगा
है
मोहब्बत
में
ये
दिल
रोने
लगा
है
तेरी
बातें
बुरी
क्यूँ
लग
रही
है
दिखे
दिल
खुद
सेे
अब
खोने
लगा
है
लड़ाई
तो
किसी
के
ज़िक्र
की
थी
उसी
का
ज़िक्र
फिर
होने
लगा
है
तुम्हें
नफ़रत
सी
मुझ
सेे
हो
रही
है
मुझे
महसूस
ये
होने
लगा
है
बिना
मेरे
भी
जी
सकते
हो
हाँ
तुम
ये
सुन
दिल
मेरा
इक
कोने
लगा
है
बड़ी
मुश्किल
ये
दिल
से
बात
निकली
किसी
का
फिर
से
वो
होने
लगा
है
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Amanpreet singh
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ज़िंदगी
अब
उजाड़
दूँगा
मैं
तेरा
हुलिया
बिगाड़
दूँगा
मैं
एक
ही
शख़्स
है
इधर
मेरा
उसको
भी
छोड़-छाड़
दूँगा
मैं
बालों
को
नोच
कर
के
बैठा
हूॅं
सर
भी
अब
तोड़-ताड़
दूँगा
मैं
जा
वहाँ
से
वो
चाकू
लेकर
आ
आज
काग़ज़
ये
फाड़
दूँगा
मैं
उसको
फिर
से
गले
लगा
कर
मैं
कुर्ते
की
मिट्टी
झाड़
दूँगा
मैं
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Amanpreet singh
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आदतन
तुझको
भी
छोड़
सकता
हूँ
मैं
घर
बचाने
को
छत
तोड़
सकता
हूँ
मैं
Amanpreet singh
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अभी
तक
उस
सफ़र
की
याद
आती
है
हर
इक
दीवार-ओ-दर
की
याद
आती
है
मैं
वो
भटका
परिंदा
हूॅं
जिसे
अब
भी
बुज़ुर्गों
के
शजर
की
याद
आती
है
मेरे
हिस्से
से
गर
वो
जा
चुका
है
तो
अभी
क्यूँँ
उस
नज़र
की
याद
आती
है
मैं
जब
दादास
पूछूँ
उनके
ज़ख़्मों
की
उन्हें
लाहौर
घर
की
याद
आती
है
यूँँॅं
बैठा
सोचता
हूॅं
काश
इस
लम्हे
उधर
होता
जिधर
की
याद
आती
है
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Amanpreet singh
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