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Pankaj murenvi
mirii banaane ko zindagi hai shamshaan aayi
mirii banaane ko zindagi hai shamshaan aayi | मिरी बनाने को ज़िन्दगी है शमशान आई
- Pankaj murenvi
मिरी
बनाने
को
ज़िन्दगी
है
शमशान
आई
उसकी
यादें
करने
हमें
परेशान
आई
रहना
था
साथ
उम्र
भर
जिस
के
वो
भी
तो
कुछ
इक
दो
दिन
की
ही
बनके
मेहमान
आई
करनी
थी
लाखों
बातें
होंठों
को
मेरे
जिस
सेे
वो
आई
भी
तो
बेज़ुबान
आई
उधर
से
आता
है
उसका
ख़त
कोई
तो
फिर
मुझको
लगता
है
जैसे
पंकज
जान
आई
- Pankaj murenvi
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भीगी
पलकें
देख
कर
तू
क्यूँँ
रुका
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
तो
मेरी
आँख
में
कुछ
आ
गया
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आकर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
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Zubair Ali Tabish
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बारिशें
जाड़े
की
और
तन्हा
बहुत
मेरा
किसान
जिस्म
और
इकलौता
कंबल
भीगता
है
साथ-साथ
Parveen Shakir
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ये
मैंने
कब
कहा
कि
मेरे
हक़
में
फ़ैसला
करे
अगर
वो
मुझ
से
ख़ुश
नहीं
है
तो
मुझे
जुदा
करे
मैं
उसके
साथ
जिस
तरह
गुज़ारता
हूँ
ज़िंदगी
उसे
तो
चाहिए
कि
मेरा
शुक्रिया
अदा
करे
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Tehzeeb Hafi
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मुझे
अब
आइनों
की
क्या
ज़रूरत
मैं
अपने
साथ
अब
रहने
लगा
हूँ
Madan Mohan Danish
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धूप
भी
आराम
करती
थी
जहाँ
अपना
ऐसी
छाँव
से
नाता
रहा
Madan Mohan Danish
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इस
से
पहले
कि
बिछड़
जाएँ
हम
दो
क़दम
और
मिरे
साथ
चलो
मुझ
सा
फिर
कोई
न
आएगा
यहाँ
रोक
लो
मुझको
अगर
रोक
सको
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Nasir Kazmi
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बात
करते
हुए
बे-ख़याली
में
ज़ुल्फ़ें
खुली
छोड़
दी
हम
निहत्थों
पे
उसने
ये
कैसी
बलाएँ
खुली
छोड़
दी
साथ
जब
तक
रहे
एक
लम्हे
को
भी
रब्त
टूटा
नहीं
उसने
आँखें
अगर
बंद
कर
ली
तो
बाँहें
खुले
छोड़
दी
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Khurram Afaq
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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फिरता
है
कैसे-कैसे
सवालों
के
साथ
वो
उस
आदमी
की
जामातलाशी
तो
लीजिए
Dushyant Kumar
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क्यूँँ
चलते
चलते
रुक
गए
वीरान
रास्तो
तन्हा
हूँ
आज
मैं
ज़रा
घर
तक
तो
साथ
दो
Adil Mansuri
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इश्क़
मुहब्बत
मेरे
बस
की
बात
नहीं
है
ये
तुम
अपने
चरणों
में
लेलो
कान्हा
मुझको
तो
Pankaj murenvi
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फिर
ले
आया
वो
फूल
आज
मेरी
ख़ातिर
उस
सेे
रूठा
रहता
भी
तो
कब
तक
रहता
Pankaj murenvi
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हम
से
पहले
क्या
था
जमीन
पर
माँ
कहती
है
इंसान
रहा
करते
थे
Pankaj murenvi
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निगाह
से
यूँँ
फेंको
जाल
मुहब्बत
का
ख़ुदको
ही
तुम
मेरी
यार
तलब
करदो
Pankaj murenvi
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मैंने
जाँचा
मैंने
परखा
है
सावन
में
याद
बहुत
बीता
पल
आता
है
सावन
में
पैसों
की
ख़ातिर
छोड़ा
था
माँ
का
आँचल
अब
मुश्किल
से
जाना
होता
है
सावन
में
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Pankaj murenvi
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