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Om awasthi
chaahat ke pahle baab se aage na badh sakaa
chaahat ke pahle baab se aage na badh sakaa | चाहत के पहले बाब से आगे न बढ़ सका
- Om awasthi
चाहत
के
पहले
बाब
से
आगे
न
बढ़
सका
ये
दिल
तुम्हारे
ख़्वाब
से
आगे
न
बढ़
सका
इज़हार-ए-इश्क़
करने
की
सोची
कई
दफ़ा
लेकिन
कभी
गुलाब
से
आगे
न
बढ़
सका
मैं
दश्त-ए-दिल
में
आब
सा
मौजूद
था
मगर
वो
कम-नज़र
सराब
से
आगे
न
बढ़
सका
सब
सिलसिले
शुरूअ
में
जान
ए
अज़ीज़
थे
लेकिन
मैं
इस
हिसाब
से
आगे
न
बढ़
सका
- Om awasthi
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नहीं
आबो
हवा
में
ताज़गी
अब
दवा
की
सीसियों
में
ज़िन्दगी
है
Umesh Maurya
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ख़ुशबू
से
किस
ज़बान
में
बातें
करेंगे
लोग
महफ़िल
में
ये
सवाल
तुझे
देख
कर
हुआ
Mansoor Usmani
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फिर
नज़र
में
फूल
महके
दिल
में
फिर
शमएँ
जलीं
फिर
तसव्वुर
ने
लिया
उस
बज़्म
में
जाने
का
नाम
Faiz Ahmad Faiz
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मेरे
साथ
हँसने
वालों
शरीक
हों
दुख
में
गर
गुलाब
की
ख़्वाहिश
है
तो
चूम
काँटों
को
Neeraj Neer
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कहाँ
चराग़
जलाएँ
कहाँ
गुलाब
रखें
छतें
तो
मिलती
हैं
लेकिन
मकाँ
नहीं
मिलता
Nida Fazli
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अपनी
क़िस्मत
में
सभी
कुछ
था
मगर
फूल
न
थे
तुम
अगर
फूल
न
होते
तो
हमारे
होते
Ashfaq Nasir
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सर्द
रात
है
हवा
भी
सोच
मत
पहन
मुझे
सुब्ह
देख
लेंगे
किस
कलर
की
शाल
लेनी
है
Neeraj Neer
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तितली
वो
ही
फूल
चुनेगी
जिस
पर
उसका
दिल
आए
इक
लड़की
के
पीछे
इतनी
मारामारी
ठीक
नहीं
Shubham Seth
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काँटों
में
घिरे
फूल
को
चूम
आएगी
लेकिन
तितली
के
परों
को
कभी
छिलते
नहीं
देखा
Parveen Shakir
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मैं
ख़ुद
को
एक
गड्ढे
में
क्यूँँ
दबा
रहा
हूँ
इक
फूल
के
लिए
ख़ुद
मिट्टी
बना
रहा
हूँ
मालूम
है
मुझे
वो
बच्ची
नहीं
है
फिर
भी
मैं
जान
बूझ
कर
के
सर
पर
चढ़ा
रहा
हूँ
जिस
फूल
में
मिरी
कुल
दुनिया
रची-बसी
है
उस
के
लिए
मैं
दिल
में
सूरज
उगा
रहा
हूँ
कोई
नहीं
मिला
जब
इस
भोर
के
समय
में
सो
मैं
भी
क्रांति
को
कम्बल
में
सुला
रहा
हूँ
उस
के
मकान
में
जिस
से
रौशनी
हुई
है
उस
लैम्प
में
मैं
अपना
ही
ख़ून
पा
रहा
हूँ
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Ajit Yadav
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मैंने
सोचा
ही
नहीं
दिल
से
निकालूँगा
इन्हें
तेरी
यादें
हैं,
मैं
ता-उम्र
सँभालूँगा
इन्हें
बन
के
दरिया
जो
निगल
लीं
तेरी
कड़वी
बातें
वक़्त
आने
पे
तेरी
ओर
उछालूँगा
इन्हें
देखते
हैं
बड़ी
हसरत
से
परिंदे
मुझको
जैसे
हर
बार
असीरी
से
बचा
लूँगा
इन्हें
तू
अगर
ज़िक्र-ए-मोहब्बत
पे
भी
ख़ामोश
रहा
जो
ये
जज़्बात
हैं
सीने
में
दबा
लूँगा
इन्हें
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Om awasthi
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इस
सेे
पहले
कि
मेरा
ज़ेहन
सँभाले
मुझको
ये
तेरी
सादा-दिली
मार
न
डाले
मुझको
Om awasthi
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हुनर
के
साथ
अगर
हौसले
निकलते
हैं
तो
ख़ुद-ब-ख़ुद
ही
नए
रास्ते
निकलते
हैं
Om awasthi
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जिसको
फ़ुज़ूल
लगती
थी
रब
की
इबादतें
पाने
को
इश्क़
टूटते
तारे
पे
आ
गया
Om awasthi
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आख़िर
ये
रोज़
रोज़
की,
वहशत
निकल
गई
इक
दिन
हमारे
दिल
से,
मोहब्बत
निकल
गई
दुनिया
के
ताम-झाम
में
,उलझा
था
इस
कदर
जो
चार
दिन
थी
जीने
की
,मोहलत
निकल
गई
भरते
थे
ज़ख़्म
छूने
से
,अहल-ए-वफ़ा
थे
जब
हाथों
से
उनके
अब
ये,
महारत
निकल
गई
सोज़-ए-हयात
में
भी,
मोहब्बत
की
इक
गली
एहसान
है
जो
तेरी,
बदौलत
निकल
गई
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Om awasthi
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