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Praveen Sharma SHAJAR
maana ki raat taaron ko ginna ajeeb hai
maana ki raat taaron ko ginna ajeeb hai | माना कि रात तारों को गिनना अजीब है
- Praveen Sharma SHAJAR
माना
कि
रात
तारों
को
गिनना
अजीब
है
लेकिन
किसी
को
नींद
न
आए
तो
क्या
करे
- Praveen Sharma SHAJAR
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लड़ाई
है
तो
अच्छा
रात-भर
यूँँ
ही
बसर
कर
लो
हम
अपना
मुँह
इधर
कर
लें
तुम
अपना
मुँह
उधर
कर
लो
Muztar Khairabadi
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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कुछ
लोग
ख़यालों
से
चले
जाएँ
तो
सोएँ
बीते
हुए
दिन
रात
न
याद
आएँ
तो
सोएँ
Habib Jalib
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रात
सोने
के
लिए
दिन
काम
करने
के
लिए
वक़्त
मिलता
ही
नहीं
आराम
करने
के
लिए
Jamal Ehsani
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सौ
चाँद
भी
चमकेंगे
तो
क्या
बात
बनेगी
तुम
आए
तो
इस
रात
की
औक़ात
बनेगी
Dagh Dehlvi
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आज
की
रात
दिवाली
है
दिए
रौशन
हैं
आज
की
रात
ये
लगता
है
मैं
सो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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सारी
रात
लगाकर
उसपर
नज़्म
लिखी
और
उसने
बस
अच्छा
लिखकर
भेजा
है
Zahid Bashir
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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तेरे
बिन
घड़ियाँ
गिनी
हैं
रात
दिन
नौ
बरस
ग्यारह
महीने
सात
दिन
Rehman Faris
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हम
सेे
ऐसा
भला
क्या
नहीं
हो
रहा
क्यूँँ
कोई
भी
हमारा
नहीं
हो
रहा
दिल
में
हिम्मत
नहीं
है
मुहब्बत
की
अब
और
अकेले
गुज़ारा
नहीं
हो
रहा
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Praveen Sharma SHAJAR
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जानता
हूँ
कि
इस
में
हारूँगा
ख़ुद
को
पर
जंग
में
उतारूँगा
वो
निशाने
पे
है
नहीं
लेकिन
इश्क़
में
तीर
मैं
ही
मारूँगा
तू
मुझे
बस
पिला
दे
थोड़ी
सी
तेरा
सारा
नशा
उतारूँगा
तू
मुझे
होश
में
तो
जाने
दे
तेरा
सारा
नशा
उतारूँगा
ज़िन्दगी
कर
ले
कोशिशें
सारी
मौत
आने
तलक
न
हारूँगा
उसके
चेहरे
में
कुछ
नहीं
रक्खा
सर
से
पैरों
तलक
निहारूँगा
वो
मुझे
एक
पल
नहीं
देता
जिसपे
मैं
ज़िन्दगी
गुज़ारूँगा
और
तो
क्या
करूँँगा
लेकिन
हाँ
इश्क़
में
हौसले
न
हारूँगा
जंग
जीतूँ
मैं
या
नहीं
जीतूँ
बैरी
की
औरतें
न
मारूँगा
जब
तलक
आँख
में
रहेगा
वो
तब
तलक
उसको
मैं
पुकारूँगा
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Praveen Sharma SHAJAR
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रास
आए
न
मुहब्बत
तो
भला
क्या
कीजे
अब
जो
होता
ही
नहीं
पास-ए-वफ़ा
क्या
कीजे
उनको
हाकिम
की
ज़रूरत
जो
अभी
ज़िंदा
हैं
मुझ
सी
जलती
हुई
लाशों
की
दवा
क्या
कीजे
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Praveen Sharma SHAJAR
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जितना
रोना
था
रो
चुके
हो
तुम
अब
तो
मरने
से
हल
निकलना
है
Praveen Sharma SHAJAR
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दुश्मनी
करता
नहीं
था
दोस्ती
होती
न
थी
जब
तलक
जलता
नहीं
था
रौशनी
होती
न
थी
बस
इसी
के
वास्ते
'आशिक़
बना
हूँ
दोस्तों
आशिक़ी
करता
नहीं
था
शा'इरी
होती
न
थी
बस
मोहब्बत
का
यही
था
हाल
उसके
सामने
वो
कभी
करता
न
था
मुझ
सेे
कभी
होती
न
थी
सिर्फ़
तेरे
ग़म
ने
इस
सहरा
में
पानी
ला
दिया
वरना
मेरी
आँख
ये
गीली
कभी
होती
ना
थी
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Praveen Sharma SHAJAR
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